कुछ जाने पहचाने लोग

चेहरे बदल बदल के मिलते  कुछ जाने पहचाने लोग

टकरा  के  भी  कतरा जाते कुछ  जाने   पहचाने लोग

बेगानों  ने  गले  लगाया  साथ  निभाया हर एक पल

अपने  मतलब से मिलते हैं कुछ  जाने  पहचाने लोग  

मंजिल तक पहुंचाया जिसने हाथ मिला कर विदा हुए

गलत  पता  बतलाते हरदम कुछ जाने पहचाने लोग

सूना  आँगन  रोशन  करते  लोग  मिले  अनजाने में

घर  में आग लगाया करते कुछ जाने  पहचाने  लोग

ठोकर  खा  कर गिरते अक्सर दिया सहारा औरों  ने

खाई   रोज  खोदते  रहते  कुछ  जाने पहचाने लोग  

टूटे  मन   को  सहलाते  वो  जिनसे  न  कोई  नाता

दिल  को  रोज तोड़ते रहते कुछ जाने पहचाने  लोग …….  

 

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नवीन राष्ट्र वंदना

रचो नए संदर्भ सम्यक, दृष्टि अब नवनीत है

रखो  सहेज  मूल्य  जो  गौरवमयी  अतीत है

संशय नहीं, सामर्थ्य है कुछ नया सा जोश है

हार की चिंता  नहीं  अब गूंजता जय घोष  है

लो  सुनो ये चाप  है  उदयीमान भविष्य का

प्रगति  का संकेत  है  ये, प्रछिप्त  दृश्य  का

अब नहीं स्वीकार हमको कोई आत्मवंचना

गायेगें समवेत स्वर में  नवीन  राष्ट्र  वंदना !

गाँधी

नेतृत्व समर्थ, था सत्यव्रती,

जन मन में बसा वो नायक था ,

भारत के गौरव का प्रतीक

वो राष्ट्र प्रेम संवाहक था |

अभिनव प्रयोग था,संबल था

मन वचन कर्म से निश्छल था,

पद लोभ मोह से बहुत दूर

नैतिकता का अविजित बल था |

तप त्याग अहिंसा और अनशन,

अदभुत था जीवन का दर्शन,

तन मन धन से था वो फकीर,

था मानवता का आभूषण |

नियति ने क्रूर विधान रचा,

जन गण में हाहाकार मचा,

हर घर में पसरा था  क्रंदन |

हे धर्मनिष्ठ, हे राष्ट्र रत्न,

है कृतज्ञ हर जन गण मन

श्रद्धा का अर्पण करते हैं,

गाँधी हम करते तुम्हें नमन !     

बदरंगे तस्वीर

करो विसर्जित आज काल के

बदरंगे तस्वीरों को !

प्रण ये कर लो प्राण आज

खींचोगे नयी लकीरों को ,

किस्से अब जो हुए पुराने

क्यों तुम उसको दुहराओ ,

नए सुरों में ढाल गीत

क्यों न  तुम आज नया गाओ !

 हो समर्थ तुम व्यर्थ यूँ ही

अपने मन से घबराते हो ,

अपनी क्षमताओं को नाहक

कमतर क्यों जतलाते हो !

कर लो ये विश्वास वीर ,

बदलोगे तुम तकदीरों को ,

करो विसर्जित आज काल के

बदरंगे तस्वीरों को !

आया वसंत छाया वसंत

आया वसंत, छाया वसंत !

झूम उठा है दिग दिगंत,

आया वसंत, आया वसंत !

स्वर्ण छटा बिखरी खेतों में

सरसों डोल रही है,

कोयल कुहुक कुहुक कानों में

मधु रस घोल रही है |

कोमल कोंपल ,नव पल्लव दल

कलियाँ है अलबेली ,

सुरभित मंद समीर संग पा

करतीं हैं अठखेली |

आम्र वृक्ष मंजरित हो रहे

भँवरे गुंजन करते,

पुष्प सुधा का संचय करते

मधु घट को हैं भरते|  

वन उपवन पर छाया यौवन

शुष्क शीत का हुआ है अंत,

सबके मन भाया वसंत,

प्रकृति पर छाया वसंत,  

आया वसंत, आया वसंत ! 

वीणावादिनी

 हमें अमृत ज्ञान दे दो !

कमल नयना ,श्वेत वसना

हंस युक्ता, वीणापाणी ,

विविध विद्या करें अर्जित

ये हमें वरदान दे दो !

बुद्धिदात्री , पद्मासना ,

श्वेत पुष्प माल धारिणी ,

जड़त्व को नष्ट कर के

गम्यता का भान दे दो !

कुंद इंदु सम प्रकाशित ,

ब्रम्हा विष्णु महेश वंदित ,

साधना को सफल कर के

सत्य का सोपान दे दो !

हमें अमृत ज्ञान दे दो !

वसंत आ गया

वसंत आ गया है लो वसंत आ गया

प्रकृति का श्रृंगार आज मन को भा गया

खेतों में पसरी आभा है सरसों के फूल की

मादक सी ये सुगंध है बागों के धूल की

पौधों पर फूटने लगी हैं कोपलें

कुहूकने लगीं हैं अब तो कोकिलें

वृक्षों ने भी धारण किया है आवरण नया

सृष्टि पर यौवन का है सौंदर्य छा गया

फूलों ने झूम चूम लिया तितलियों का मुख

भंवरा भी अपना राग है सुना गया

हर्षित हुआ हर मन पर आनंद छा गया

वसंत आ गया है लो वसंत आ गया ……..   

हर लम्हा

उत्साह नया कुछ चाह नई  

जीवन में खुशबू भरा करो

उन्मुक्त हृदय से नित नूतन

स्वप्न नयन के पढ़ा करो

उलझन की आहट आये तो  

मन की भी तुम सुना करो

उलटे फंदों को सुलटा कर

रिश्तों की चादर बुना करो

भटकन की कीचड़ में से तुम

आशा के मोती चुना करो

निजता के पल को सहलाओ

कर्मों को अपने बड़ा करो

जज्बा जब भी कमने लगे

कुछ जख्म  पुराने  हरा  करो

सूनेपन  का हर  लम्हा

उम्मीदों से तुम भरा करो ………….

 

रस्म जमाने का

हवाएं  कुछ  नमीं  सी ले के आई हैं

कोई कतरा ख़ामोशी से गिरा होगा

पीले चाँद में दिखता है जिसे हुस्न बेदाग़

इश्क  का  मारा  कोई  रहा  होगा

लोग आये  हैं  हमें  समझाने वो जिनका

अपना कोई हिसाब पुराना होगा

बेदिली लाख कर लो दिल से अपने चाहे

रस्म जमाने का तो निभाना होगा

न गिला है किसी से न शिकवा ‘दिव्यांश’

बढ़ाये हाथ कोई तो मिलाना होगा ……..  

पिता

समग्रता की छाँव है , स्नेह का आवेश है ,

आशाओं की मरुभूमि में  हरित प्रदेश है |

     उपस्थिति  से इसके परिवार में प्रकाश है,

     पिता नहीं तो बच्चों के जीवन में प्यास है |

कोमल कल्पनाओं  का सुखद आधार है ,

हर नवीन कथानक का वो ही सूत्रधार है |

     पिता  के  प्यार में पलता अनुशासन है ,

     कर्तव्यों ,दायित्वों का सम्यक पोषण है |  

श्रमिक का प्रतिरूप है ,सौम्य सुविचार है ,

पिता  का  हाथ साथ हो तो ही बाजार है |

     पिता  है  तो  रोटी  है , बेटा और  बेटी है ,

     परिवार  के  लिए  इसने दुनिया समेटी है |

घर   की  अभेद्य  सुरक्षा  दीवार  है ,

पिता से ही माँ का हँसता संसार है ||