कदाचित

 

परिवेश की पुनरावृतिकदाचित

सन्दर्भों का संचयन

स्मित निर्निमेष अशेष

विस्मृतियों का विवेचन

जिजीविषा की विवशता

निवर्तित संबंधों का निर्वहन

अदृश्य अस्मिता का आकलन

शून्य का संभरण

तन्द्रा कोई क्षिप्त

शुष्क स्नेह सिक्त

प्रस्थान की प्रतीक्षा

मोक्ष नहीं दीक्षा

पुनः पुनः प्रयास

प्राण का आभास

संवरण निस्तरण

कदाचित यही जीवन ….

दीपोत्सव

 

 

सजा धजा साकेत निहारेदीपोत्सव

कब आयेगें राम ?

अट्टहास कर रहा है रावण

कौन दिलाये त्राण ?

गहन अमावस घिर आया है

आशा दीप जलाओ

बंद करो अब रुदन अमंगल

मंगल ध्वनि बजाओ

अंतस तम से बंधमुक्त हो

प्रज्ञा दीप सजाओ

श्री समृद्धि के स्वागत को

स्व सामर्थ्य जगाओ

दीपपर्व की मंगल वेला

सब सामोद मनाओ 

 

 

 

पाणिग्रहण पर लगा ग्रहण

 

दरक रही हैं दीवारें नित

दुविधा में डूबी दुहिता

गौण हो रही गुण ग्राहकता

और संबंधों की शुचितापाणिग्रहण पर लगा ग्रहण

मंडी सजी है रिश्तों की

और कन्यादानी रहे हैं तोल

देखो कैसी ये विडम्बना

मांग रही माँ दूध का मोल

कितने दिन होगा निबाह

रखेगें सब  सम्बन्ध सहेज

बनेगे  जब व्यापार विवाह

और दावानल बने  दहेज

जागो यौवन बहुत हो चुका

अब ना माँ का  दूध लजाओ

पाणिग्रहण पर लगा ग्रहण है

आहुति दे कर  मोक्ष दिलाओ …..

गंगा

 

गंगा विचार है दर्शन है

नित पूजन है अभ्यर्थन है

है संस्कृति की संवाहक

गंगा सभ्यता का दर्पण हैganga

तेजोमय प्रवाह है ये

जीवन पद्धति निर्वाह है ये

है मोक्षदायिनी उद्धारक

ऊर्जा का एक उछाह है ये

उर्वरता का वैविध्य है ये

वैतरणी का सानिध्य है ये

है मातृशक्ति जीवन जननी

आगम निर्गम आविध्य है ये

प्राणों में मूलाधार है ये

आनंद है ये त्योहार है ये

है परिवर्तन की द्रष्टा यह

भारत भू को उपहार है ये  …….

कायाकल्प

 

विमल तरंगिनी भगीरथ नंदिनी

गंगे हुई उदास

अमृत जल है बना हलाहल

कौन बुझाये प्यासकायाकल्प

करे आचमन कैसे कोई

और लगाये डुबकी

हुई जाह्नवी विकल मलिन मुख

नहीं सुने कोई सिसकी

हुई त्रिपथगा आज विपथगा

धनजल बन गया ऋणजल

मोक्षदायिनी सुरसरि गंगा

बनती जा रही दलदल  

बहुत हो गया और नहीं अब

करें सभी संकल्प

निर्मल स्वच्छ धवल गंगा हो

पुनः हो कायाकल्प …..