In search of Incredible

 

In today’s tech-packed world, we are constantly in search of a perfect tech companion. It could  be  a  Smart watch, a Tablet or even a Glass, but every other gadget or gizmo could be easily out shined by an incredible Smartphone.

Smartphones  present  in  the  market  are  very  productive  and  can  do  wonders with a simple touch but still they are not interactive enough to  understand  and  reciprocate  to our feelings and emotions. I would love to indulge myself in a heart to heart talk with my phone.

Its   all  about  the  productivity   and  U.I  that  matters  for  me.  Octa, Hexa or Deca core processors  with  huge  ram and sci-fi displays are immaterial   in the absence of friendly user  environment. It  would  be  great  for  me  if  my  smartphone  could take care of my house hold activities. Monitoring  the security, keeping a track of the visitors and placing purchase orders for  the  consumables  meant for daily use. I would like to control all my   remote  operated   gadgets  and   appliances  with   my   smartphone. Turning   the  lights on/off,  folding/unfolding  the  blinds  and  maintaining the temperature  at  comfortable levels  would  be  of   great  help. In  case of any malfunctioning of electronic or electrical product the phone should be capable  to  identify and call or inform the technical service team.

What  if  my  smartphone  drives  my  car, drops my kids to the school and takes me to the office  while  I  am  working  on  the  backseat. I  wish  my smartphone to understand  my  moods and gestures recognize my family and friends and keep a track of my clients. How cool would it be if my     phone  advises  me, answers  my  queries and clears my doubts if any? It should take care of my health, record the vital parameters and advise accordingly to keep me in sound health.

I aspire for a phone which could accompany me during my singing sessions and correct me if something goes wrong with the tempo and tune. I would love to share my creativity with  my phone  and watch my thoughts turning into beautiful piece of artwork or a well composed poetry.

Right  from waking  me  up in the morning to biding me good night, my phone should be my alter ego.

Advertisements

शुभेक्षा

*

नित नूतन संकल्प करें  

सन्दर्भ नए साकार करें

नव गति ,नवल विचारों को ,

मुक्त ह्रदय स्वीकार करें

ज्ञान प्रकृति है ,ईश हैं उदगम  

तत्व को अंगीकार करें

मंगलमय हो हर क्षण जीवन

शुभेक्षा स्वीकार करें……….

             **

यूँ ही हंसता रहे ये सावन

हर लम्हा मनभावन हो

प्रमुदित मंगलमय हर क्षण हो

विजय हमेशा आँगन हो

यशः कीर्ति दानशीलता

सुख समृद्धि और सम्मान

सदा आपकी श्री वृद्धि हो

यही कामना है श्रीमान……..

              ***

नित खेलो तुम नई बाजियां

जीत तुम्हारे आँगन हो  

प्रिय जनों का सदा साथ हो  

न विरह का सावन हो

खिली रहे मुस्कान हमेशा

आगत सब मनभावन हो

चाहे जितने बाँटो नित दिन

पत्ते पूरे बावन हो……..

अभिशप्त पलाश

देहरादून की घाटियों में घूमता सहस्त्रधारा की  ओर  चला जा रहा था | फागुन मास का बौराया मौसम और होली का मदमस्त माहौल मन प्राण को अपने सम्मोहन में आबद्ध कर चुका था | घुमावदार पहाड़ी सड़कों पर फिसलती नज़रें अचानक प्रकृति के अदभुत  सौदर्य में उलझ  सी गयीं और मेरे पैर कार की ब्रेक पर दबते चले गए | ऊँचे पत्रहीन पलाश के पेड़ एक कतार में पूरा सज धज कर  यात्रियों का स्वागत कर रहे थे | लाल  और हलकी नारंगी आभा बिखरते टेसू के फूल अत्यंत मनोहारी लग रहे थे | कैमरे में इस अनुपम छटा को कैद करता मन बार बार सोच रहा था कि प्रकृति ने पलाश के साथ न्याय किया है या कि अन्याय |

फूल तो दिया पर निर्गंध जैसे किसी रूपवती रमणी को मातृत्व की सुगंध से वंचित कर दिया हो | ऊँचाइयों पर अस्तित्व तो दिया पर पुष्पसुधा विहीन कर भंवरों के सानिध्य का अवसर छीन लिया | बड़े बड़े ,गोल गोल चिकने पत्ते भी दिये ,वो भी तीन तीन एक साथ ,पर देव पर अर्पण होने का सौभाग्य छीन लिया | कहाँ विल्वपत्र और कहाँ ढाक के तीन  पात ! वसंत के आगमन की सूचना देता पलाश जेठ की तपती दुपहरी में भी बदरंग नहीं होता | तपती हवाओं के थपेडों को सहता निष्प्राण वातावरण को अपने दहकते सौन्दर्य से जीवंत बना देता है | टेसू के फूल की जीवंतता भले ही माला में न गुंथे ,देव के स्पर्श से अछूता रह जाय,किसी रूपमती के गजरे की शोभा न बन सके पर सूखने के पश्चात ये बहुत कुछ दे जाते हैं | फागुन की मस्ती में डूबा सौन्दर्य बिना टेसू के रंग के निष्प्राण लगता है | ढाक के पत्तों से बने पत्तल पर परोसा व्यंजन और भी स्वादिष्ट लगने लगता है | टेसू के फूल हों,कलियाँ हों या पेड़ की छाल, इनके औषधीय उपयोग से अनेक व्याधियों का निदान संभव हो जाता है | पलाश के पेड़ का हर हिस्सा मानव समाज को अपनी उपयोगिता से अनुगृहित कर जाता है | पता नहीं किस भूल ने पलाश को एक अभिशप्त जीवन जीने के लिये विवश कर दिया | क्या पलाश इस अभिशाप से कभी मुक्त हो पायेगा ???   

ख्वाब सुहाना बचपन का

दोपहर का खाना खा  कर धूप सेंकने बरामदे में रखी आराम कुर्सी पर पसर गया |

सर्दियों  की  गुनगुनी  धूप  और   एफ.एम  पर   बजता   एक   सुरीला  सा  गाना,

आया  है  मुझे  फिर याद वो ज़ालिम , गुज़रा  जमाना बचपन का ” और  मैं  खो

गया   अपने  प्यारे  बचपन  के  दिनों में | उन  दिनों   हमारा  स्कूल  घर  से  कोई

छह-सात किलोमीटर की दूरी पर  हुआ  करता था | गर्मियों में सुबह साढ़े पांच के

आस  पास  हमारे   दोस्त  सड़क  पर से आवाज़ लगाया करते और मैं स्कूल बैग 

उठाये  दौड़  पड़ता था | हरेक  सुबह  कुछ  नया रोमांच ले कर आती थी | उछलते

कूदते हमारी टोली चल पड़ती थी स्कूल  की  ओर | गवर्नर  हाउस  के  पास  पहुँच  

कर  सिपाहियों की कदम ताल देखते और उन्हें सलामी देते | सिपाहियों  को  भी 

शायद  हमारी   सेना  का  ही  इंतज़ार  रहता  था |  हमें  देख वो भी उत्साह से भर  

जाते  और  उनकी  चुस्ती   और   भी  बढ़ जाती | थोड़ा  आगे  बढ़ते  ही  सड़क के

दोनों ओर  बड़ी बड़ी  सरकारी   कोठियां   शुरू  हो  जातीं | कोठियों  के चारों  तरफ  

तरह   तरह   के  फलदार   वृक्ष   भी   लगे  हुए  थे |  हमारी मंडली इस सड़क पर

खासी   उत्साहित   हो   जाती |  सबकी  निगाहें  इस  अन्वेषण में लग जातीं कि

कौन   सी   कोठी  जनशून्य  दिख  रही  है | सही   मौका  देख  एक  एक कर सब  

हाते  के  अंदर दाखिल हो जाते  और  फिर  कोई  हरी  जलेबी  तो  कोई  बेर  और

रसभरी  पर  टूट  पड़ते | आम  के  पेड़ों  पर  टिकोले  आ  गए  होते  थे |  हमारी

कोशिश रहती थी कि  टिकोलों  को  नुकसान  न पहुंचे, नहीं  तो  आम  का  मज़ा 

जाता   रहेगा |  अमरुद   के   पेड़   हमारे  प्रकोप  से  त्रस्त  रहते  थे |  कोई  पके

पपीतों  पर  निगाहें   लगाता  तो  किसी  की  नज़र  चिनिया  केले  के हत्थों पर

टिक जाती | इस  फलाहार के  बाद  विद्यालय  की  सुध  आती  और  सब  एक

दूसरे को चलने के लिये आवाज़ लगाने लगते |  प्रातः  काल  की मंद सुवासित

हवा का  आनंद  लेते   और   कल  किस   कोठी  में  फलाहार  करना  है , इसकी

योजना  बनाते  कब  हम  स्कूल  की  गेट  पर  पहुँच  जाते , पता भी न चलता |

उस   प्राकृतिक  परिवेश   में  हँसता  खेलता   बचपन  कब  बीत  गया ,इसका

पता भी न चला |

कानों में गूंज रही थीं गीत की पंक्तियाँ ;

वो खेल वो साथी  वो झूले ,वो दौड़ के कहना आ छू ले

हम आज तलक भी न भूले,वो ख्वाब सुहाना बचपन का …………….

2011 in review

The WordPress.com stats helper monkeys prepared a 2011 annual report for this blog.

Here’s an excerpt:

The concert hall at the Syndey Opera House holds 2,700 people. This blog was viewed about 8,200 times in 2011. If it were a concert at Sydney Opera House, it would take about 3 sold-out performances for that many people to see it.

Click here to see the complete report.

diwyansh द्वारा Uncategorized में प्रकाशित किया गया