भस्मासुर

 

जनता के सेवक सत्ता पाते ही खुदा हो जाते हैं

सरोकारों की कौन कहे ,जनता से ही जुदा हो जाते हैं

आम आदमी से बना लेते हैं दूरी

इनके मुँह में है राम ,बगल में छुरी

परिभाषाएँ रातों रात बदल जाती हैं

देश की अर्थव्यवस्था गिरती है ,इनकी संभल जाती है

वादों और इरादों की बरसात करते हैं

पांचसितारा लंच के बाद भुखमरी की बात करते हैं

भ्रष्टाचार का भस्मासुर भारत से उस दिन भाग जायेगा  

समाज का अंतिम आदमी नींद से जिस दिन जाग जायेगा ………  

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समर शेष है अभी

 

समर शेष है अभी

रथी अभी रुको नहीं ,क्षेत्र में झुको नहीं

व्याल हो कराल हो ,दृश्य वो विकराल हो

समग्र शक्ति झोंक दो ,हर बला को रोक दो

विपथ प्रवाह मोड़ दो ,व्यूह सभी तोड़ दो

विजय वरण के वास्ते ,मोह सभी छोड़ दो  

अजेय हो तुम शौर्य हो , कर्म से मौर्य हो  

जब तक न जीत लो ये रण ,निरत रहो हरेक क्षण

शंखनाद करो अभी , समर शेष है अभी ……………

मल्हार

 

सूखे पड़े हैं खेत सब फट गयी दरार

सुर नहीं हैं लग रहे पर गा रहे मल्हार

पता नहीं कब छायेगी श्यामल सी एक घटा

प्यासी नज़र के सामने बिखरेगी एक छटा

बादल हैं डगर भूल गए बनेगी कैसे बात

बीता अषाढ़ मास पर आई नहीं बरसात

सावन है आ गया पर आये नहीं सजन

अंतर विकल है म्लान मुख निर्जल से हैं नयन

नाचेगा मन मयूर कब पड़ेगी कब फुहार

देवराज सुन भी लो धरती की ये पुकार ……….

निश्चेतन

 

आजकल जब भी कलम उठाता हूँ

विचारों को सहेज, शब्दों को सजाता हूँ

कोई खास खबर दिल को दहला देती है

सर उठाती भावनाओं को सुला देती है

श्रृंखला बनने से पहले ही बिखर जाती है

संवेदनाएं असमय ही मर जाती हैं

गुजरा हुआ कल सताने लगता है

अनागत का अहसास डराने लगता है

प्रसव की पीड़ा अचेत कर जाती है

एक निश्चेतन परिवेश का सृजन कर जाती है …..

राखी की लाज

 

बेटिओं की आबरू को तार तार कर रहे

इंसानियत को सरेआम शर्मसार कर रहे

कौरवों की भीड़ है द्रौपदी हताश है

प्रतिध्वनित हो रहा क्रूर अट्टाहास है

संस्कृति अचेत हो रही संस्कार सो गया

पूरब का तेज पुंज आज किधर खो गया

लज्जा का चीरहरण कैसे रोक पाओगे

कब सुनोगे आर्तनाद कब तक तड़पाओगे

मत लजाओ दूध को ,संभालो तुम आज को

मिटकर भी रखना तुम राखी की लाज को ……….

 

याचना

 

क्या मैं तुझको करूँ अर्पण ,सब तो तेरा ही दिया

है कृपा तेरी ये दाता जो भी पल हमने जिया

तुमने मुझको दिया अमृत,जब गरल मैंने पिया

नहीं मेरी कोई क्षमता जो किया तुमने किया

कृपा तेरी जान सुख दुःख अपने सर माथे लिया

मैं अकिंचन दास प्रभुवर कर रहा हूँ प्रार्थना

मेरी सांसों में तुम बसना यही मेरी याचना ………

पौरुष

 

समय के सीने पर पौरुष लेख जो लिखा करेगा

याद रखेगी ये दुनिया नमन उसको जग करेगा

नहीं विचलन ,नहीं फिसलन ,लक्ष्य भेदन जो करेगा

सभी उससे ही जुड़ेगें ,सफलता से जो जुड़ेगा

युग बदलते ,मान्यताओं में नए आयाम जुड़ते

कुछ नए संदर्भ बनते ,कुछ पुराने हैं बिगड़ते

कुछ समय से हार जाते ,कुछ हैं सजते और संवरते

जूझते हालात से जो ,वो भला कब हैं बिखरते !  

साध को जो साध करके रेखाओं को रचेगा  

याद रखेगी ये दुनिया नमन उसको जग करेगा …………

कविता

 

जरूरी नहीं कि हर कविता में कोई धार हो

व्यथा हो ,व्यंग हो या कोई विचार हो

भीड़ में दिखने वाला हर चेहरा भाता नहीं है

हाथ मिलाने भर से जुड़ता कोई नाता नहीं है

गाना आये या न आये हम अक्सर गुनगुनाते हैं

कविता बने या न बने अपने दिल की सुनाते हैं

यूँ तो हर क्षण प्रवाहित होती विचार सरिता है

पर जो आपके अंतर को भिगो दे, वही कविता है …..

जिंदगी

 

जब मन में लगी हो कोई आस

हर पल अटकी रहती है साँस

लटकती रहती है ऐसी फाँस

कि जी हो जाता है उचाट, चित्त उदास

हर क्षण बढ़ती जाती है एक प्यास    

कब और कैसे होगी ये पूरी

इसी चाहत में किसी तरह जिये जाते हैं     

सूने दिन और रातें अधूरी

चाहे रात हो कितनी भी लंबी

पौ तो फटती ही है

चाहे जैसे भी हो

जिंदगी तो कटती ही है …….

अवतार


देर बहुत कर दी प्रभु अब तो अवतार लो

प्रजातंत्र पस्त है, नेतृत्व मस्त है

राष्ट्र की दशा पर थोड़ा बिचार लो

अर्थतंत्र देश का जा रहा गड्ढे में

तेरा ही सहारा प्रभु अब तो संभार लो

युग युग अवतार लिए लोक कल्याण को

जल्दी कुछ करो प्रभु कलयुग के प्लान को

घूसखोर हाकिम है , चोर व्यापारी है

ब्लैकमनी   मंहगाई  कालाबाजारी  है

त्राहिमाम त्रहिमाम मची है चारो ओर

अब तो एक एक दिन काटना भी भारी है

घर में  लगी है आग घर के चिराग से

जल्दी कुछ करो प्रभु अब तो उबार लो

देर बहुत कर दी प्रभु अब तो अवतार लो ……….