मनुज तुम महान हो

 

अजेय विज्ञ प्रग्य हो

समर्थ हो समग्र होप्रणेता

उदात्त दत्त चित्त हो

सुकर्म में प्रवृत्त हो

आस्था अगम्य हो

प्रेरणा अदम्य हो

अस्मिता अमूल्य हो

समष्टि स्वर्गतुल्य हो

स्वयं सिद्ध प्राण हो

उर्ध्वमुखी ज्ञान हो

मोह तृण समान हो

दिव्यता का भान हो

मनुज तुम महान हो

मनुज तुम महान हो …………….

चलो चलें उस ठौर

 

चलो चलें उस ठौर जहाँ पर न हो कोई कोलाहलचिंतन

शांत सतह के नीचे न पलती हो कोई भी हलचल

नयनाभिराम सौन्दर्य लाभ को न हो दृष्टि लालायित

क्षुधा तुष्टि का ध्येय लिये दिशाहीन भटके विचलित

अंतरतम की अकुलाहट को सुने ,गुने कुछ ध्यान धरे

हीरे मोती माणिक पत्थर किस छाजन पर गौर करे

पल पंक्षी यूँ उड़ा जा रहा ,होता जाता है ओझल

कर ले पूरी बात समय से चपल चित्त मत हो चंचल

चलो चलें उस ठौर जहाँ पर न हो कोई कोलाहल……