चाहत

 

आसमान को छूने की चाहत

जमीन से दूर कर देती है

स्वर्ग की चाहत धर्मराज को भी

अकेला चलने के लिये

मजबूर कर देती है

ज्यों ज्यों ऊँचाइयों पर जाओगे

ठंढी सफेद बर्फ ही पाओगे

संवेदना शून्य और सर्द अहसासों के बीच

किसी मरीचिका में खो जाओगे

दुनिया को भले ही कर लोगे अपनी मुट्ठी में

पर वो मचलती खिलखिलाती किलकारियां

नहीं ढूँढ पाओगे

आम के कोलाहल से दूर

किसी खास एकांत की तलाश

अपनी अस्मिता से दूर कर देती है

हर कदम पर बढ़ते जाते हैं फासले

अकेला चलने के लिये

मजबूर कर देती है …….

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असमंजस

 

आज नहीं कुछ कह पाऊंगा

इस दलदल से कैसे निकलूं 

कैसे फिर अहसास जगाऊं

बिखर गए हैं छंद छबीले

कैसे फिर आलाप लगाऊं

मध्यम पंचम धैवत कोमल

नहीं लग रहा कोई भी स्वर

बस्ती भरी मकानों से है

नहीं दिख रहा कोई भी घर

घिरी घटाएं उमड़ घुमड़ कर

पता नहीं कब बरसेगीं  

आम आदमी की उम्मीदें

कब तक यूँ ही तरसेगीं

बेशर्मों की इस बस्ती में

कैसे नज़र झुका पाउँगा

आज नहीं कुछ कह पाऊंगा ………..

घोटाला

देश असहाय ,जनतंत्र बेचारा बना फिरता है 

संसद पर लटका ताला है

आस्था मरती रहे तो मरे

जनता को कौन देखनेवाला है !

सत्ता है दावत है हाथ में प्याला है 

किसको पड़ी है जो किसीको मिलता नहीं निवाला है !

टोपी है कुर्ता है गले में माला है

रोज मनाते हैं वो दिवाली 

चाहे देश का निकले दिवाला है !

कर लोगे आप हिफाजत कितनी

चोर जब घर का रखवाला है !

मत कुछ लिखो देखो या बोला करो

उनके पास डंडा चलाने वाला है !

ये सब एक ही थैली के चट्टे बट्टे हैं  

एक से बड़ा दूजा  गाल बजाने वाला है !

जनता बेचारी जी रही है वादों  पर

दम तोड़ती आशाएं हैं कौन आंसू बहाने वाला है !

इनके हाथ हैं आसमान से पाताल तक 

इनकी नज़रों से कुछ नहीं बचने वाला है !

करते हैं नुमाइंदगी जनता की ये

क्या हुआ जो कर लिया घोटाला है !

कर सको जो तुमभी तो किसने रोका है

लूटो बांटो खाओ कौन ऊँगली उठाने वाला है !   

दलाली है रिश्वतखोरी है और घोटाला है

राजनीति है राजनेता हैं और गड़बड़झाला है

रहो चुपचाप बस इतना इंतज़ार करो

कब ये देश रसातल में जानेवाला है

अंधेर

 

जिधर देखो स्वार्थ का बोलबाला है

झूठ की कट रही है मज़े में

सच्चाई का मुंह हो गया काला है

समर्पण ,त्याग तो पागलों की बातें हैं

साधुओं को भीख भी नहीं मिलती

दुर्जन पहनते मोतियों की माला हैं

पसीने की कमाई में अब कहाँ बरकत

ईमान की रोटी अब नहीं बनती

चोरबाजारी है सट्टा है और हवाला है

देश और समाज की पड़ी है किसको

वो और थे जो हँसते हँसते झूल गए

अब तो सत्ता है लाल बत्ती है घोटाला है ……