कारोबार

 

सच्चाई बिक रही है बिक रहा ईमान है

नैतिकता के संग संग बिक रहा इंसान है  

पानी महंगा  और कौड़ी में बिकती जान है

सादगी शर्मिंदा हो रही झूठ पर गुमान है  

जिधर नज़र जा रही है सज रहा बाजार है   

सेल रिश्तों की लगी है और सस्ता प्यार है

घुन लग रहा संबंधों में कचरे में व्यवहार है

लंपटों से चल रहा अब धर्म का व्यापार है

चांदी कट रही बेशर्मों की लज्जा अब लाचार है

देख रहा ‘दिव्यांश’ व्यथित हो ,कैसा कारोबार है !!!!!

आवारगी

 

जब अंधेरों से दोस्ती कर ली

उजाले हमें मुँह चिढ़ाने लगे

गैरों से कोई शिकवा नहीं है

अब अपने आजमाने लगे

दिया जमाने ने बदले में जो कुछ

बेबाकी पर अपने पछताने लगे

पल दो पल में पाया था वो सब

जिसे भूलने में जमाने लगे

टूटे घरौंदे और सूनी निगाहें

सपनों को उनमें बसाने लगे

खुशियों ने जब छोड़ा दामन हमारा

गाने पुराने हम गाने लगे

तनहाइयाँ फिरती हैं आवारगी में  

अफसाने भी सुनने सुनाने लगे ………..

अनवरत

 

अपनी हर हार पर हम मुस्कुराते रहे  

मंजिलों की ओर कदम बढ़ाते रहे  

कायर वही जो आँसू बहाये हार पर

हम तो हर विघ्न को गले लगाते रहे

स्वप्न टूटे ,आस टूटी ,आस्था बनी रही

मन में ज्योति लगन की अनवरत जली रही

हौसलों को कभी हमने न झुकने दिया

कोशिशों को किसी हाल न रुकने दिया

ग्रह नक्षत्रों में कभी अपने को न खोने दिया

कुंडली के फेर में चाहत को न रोने दिया

कल भी खुश थे ,आज का भी वक्त अपना खास है  

जीयेगें भरपूर कल को ,मन में ये विश्वास है …..   

क्यों

 

लोग मौसम की तरह रंग बदलते क्यों हैं

जो गिरने से डरते हैं वो चलते क्यों हैं !

ख्वाबों की मंजिल अगर हकीकत में है

तो सपने हमारी आँखों में पलते क्यों हैं !

इश्क में  मिट जाना अगर इबादत  है

लोग  होश खो कर  सँभलते  क्यों  है !

ये सच है कि  कफन में जेब नहीं होती

दौलत जुटाने को लोग मचलते क्यों हैं !

‘दिव्यांश’  देता  हमें  वो ऊपरवाला है

पता  नहीं  वो  हमसे  जलते क्यों हैं !    

लम्हे

 

अपना गम ख़ामोश था और दर्द भी था थम गया

फिर भी जाने क्यों जमाने की नज़र हम पर रही

दिल  की  बातों  को हमेशा राज़ ही रहने  दिया

फिर  हवाओं  को  आज  बेचैनी ये कैसी हो रही

मेरी  चाहतों  को  अब  भी किसी का इंतज़ार है

क्या हुआ जो हर कदम पर ठोकर हमें लगती रही  

एक  अरसे  बाद  लम्हे  फिर से कुछ कहने लगे

क्या पता  इतने दिनों तक चुप सी क्यों लगी रही

राज़  अपने दिल में रखिये किसी पर मत खोलिए

क्या कहें  ‘दिव्यांश’  दिल में पीड़ क्या उठती रही  …..

गाँव

 

जमीन से जुड़े रहने का अहसास

एक बार फिर ले आया है गाँव के पास

अब तो बस कहने को ही गाँव है

न तो वो चौका ,न चूल्हा ,न ही वो ठांव है 

माहौल का वो सुकून अब खोता जा रहा है

लोग बूढ़े और गाँव जवान होता जा रहा है

मिटटी की मासूमियत पर

कोलतार का काला रंग चढ़ गया है

बस्ती में आधुनिकता का

सूखापन बढ़ गया है

बैठक ,ड्राईंगरूम में खो गई है 

भाईचारे की भावना सो गई है

अब कहाँ वो बगीचे और खलिहान

खेतों में उग आये हैं मकान ही मकान

सिकुड़ता जा रहा है जमीन के साथ साथ

संबंधों का विस्तार

विकास की चकाचौंध में

खो गए हैं घर बार

उस अहसास को जीने का प्रयास जारी है 

इस बदले हुए परिवेश में

अपने गाँव की तलाश जारी है ……….

रिटायरमेंट के बाद

 

सरकारी सेवा से रिटायर पदाधिकारी

जैसे बिना तेल के कोई मोटर गाड़ी  

अब बनने ठनने का मन नहीं करता

जी हो गया बिलकुल उचाट है

अब न चपरासी, न फोन न गाड़ी

न ही सरकारी बंगले का ठाट है  

अब किस पर रौब गाठेंगें

किस को आँखें दिखाएंगें

अब तो खुद ही कुआँ खोदेगें

खुद ही प्यास बुझायेंगें

कभी जिन पर हुक्म चलाते थे

अब वो ही हमें सुनाएगें

जिनसे दफ्तर में इंतज़ार करवाते थे

अब वो ही  हमसे चक्कर लगवायेगें

आगे कैसे कटेगी ये सोच कर जी डरता है

रिटायरमेंट के बाद सरकारी सेवक

न तो जीता है न ही मरता  है ….  

अंधी दौड़

 

पगडंडी सा पड़ा हुआ

मैं देख रहा दीवानों को

अंधी दौड़ में हांफ रहे  

अपनों को बेगानों को

किसे सुनाऊं ,कौन सुनेगा

सबकी अपनी एक व्यथा

अपने में ही उलझे सारे

कौन सुनेगा मेरी कथा

दिशाहीन सपनों को कैसे

कर पायेगें वो साकार

संबंधों अहसासों का जो

रोज़ कर रहे हैं व्यापार

सुनो दीवानों धड़कन अपनी

चाहत को समझाओ तुम

जितनी चादर पास हो तेरे

उतना पैर फैलाओ तुम !  

लिखता और मिटाता हूँ

 

लिखता और मिटाता हूँ

हार – जीत ,खोना और पाना

जीवन की है रीत यही

अपनी धुन में डूबा हर पल

हर सन्दर्भ सजाता हूँ

जाने अनजाने लम्हों से

आस लगाते अक्सर लोग

नहीं किसी से रखना आशा

मन को ये समझाता हूँ

हर कोई अपने में भूला

अपनी मंजिल ढूंढ रहा

कहाँ ठिकाना अपना ऐ मन

नहीं समझ ये पाता हूँ

कोलाहल के बीच घिरा मैं

शोर न मन का सुन पाता

एक पल लगता है जो पराया

दूजे पल अपनाता हूँ   

कलम लिए हाथों में अपने

तन्मयता से लगा हुआ

नित्य नये कुछ शब्द चित्र मैं

लिखता और मिटाता हूँ ……..

सौदा

 

वेदना संतृप्त हो कर पिघलना चाहती है

अनमनी सी घटाओं से बरसना चाहती है

भींगते मन से कोई महसूस करना चाहता है

बूंद को मोती समझ कर सजा लेना चाहता है

पर कहाँ सन्दर्भ ऐसे ,चाहतें कहाँ हैं ऐसी

स्वार्थ के साये में समर्पण की आस कैसी ?

सजे हैं बाजार संबंधों की लगती बोलियां हैं

बिक रही हैं भावनाएँ लुट रहीं अब डोलियाँ हैं

चलो हम भी कर लें सौदा बेबसी लाचारगी का

शराफत को छोड़ ओढ़े लबादा आवारगी का ………