आकलन

 

क्या  बताऊँ किस तरह से रिक्तता को  है जिया

बुझ  गए  पलों  को  पुनः  प्रज्वलित कैसे  किया

कई  अवसर  ऐसे  आये स्वप्न जब  थे  सो  गए

स्याह  साये  समय  के  थे  चाह जिसमें खो गए

समय  की  हर  शर्त  को  स्वीकार  हमने  किया

लोभ  मद  पद  मोह  का प्रतिकार हरदम किया

नियति  से  न हार मानी विष विफलता का पिया

धैर्य  का  न  साथ छोड़ा  कर्म  पर  ही बल दिया

सत्यनिष्ठ रहा  अविचल  मन  में बसाये ईश को

हर  सफलता कर दी  अर्पित मातृ स्नेहाशीष को

आकलन  करता  विगत का मन में एक स्थैर्य है

आते  कल  को जोहता मैं अब न कोई अधैर्य  है ………….

 

ग्रहण

 

नित्य और निरंतर चलायमान कालचक्र ,सृष्टि  के स्वरुप को प्रत्येक क्षण प्रभावित

करता नई चुनौतिओं  को आमंत्रित करता रहता है | एक प्रश्न सदैव ही मानव मन

को  मथता  रहा  है  कि  क्या  सुख  या  दुःख , प्रसन्नता  या  अवसाद , उन्नति या

अवनति , सफलता   या   विफलता , यश  या  अपयश , हानि  या  लाभ  , निरंतर

परिवर्तनशील  और  चलायमान  कालचक्र का परिणाम हैं या प्रारब्ध का प्रतिफल |

पूरी  सृष्टि  को  अपनी ऊर्जा से अनुप्राणित करने वाले  भास्कर भी ग्रहण से ग्रसित

होने  पर  त्याज्य  हो जाते हैं | कैसी  विडंबना है कि सूर्य के तेज से प्रकाशित चंद्रमा ही ग्रहण  का  कारण  बन जाते हैं और

ग्रहण  की  अवधि  में  दिवाकर  की अक्षय ऊर्जा पर पलने  वाले  जीव  उधर देखना तो दूर  उनकी छाया तक से बचते नज़र

आते हैं | इस प्रसंग  पर  विचार  करने  के  उपरांत  विपरीत परिस्थितिओं  में  घिरे  मनुष्य से कन्नी काटते लोगों को देख

कुछ  भी आश्चर्यजनक प्रतीत नहीं होता | संध्या के आगमन के साथ ही अपनी परछाई भी साथ छोड़ जाती है तथा नितांत

अकेले  होने  का  अहसास अंतर्मन पर दस्तक देने लगता है | अवसाद्पूरित और विपरीत परिस्थितिओं  में एकाकीपन ही

एकमात्र  सहचर रह जाता है | ग्रहण से मोक्ष  और सृष्टि   का   पुनः   पूर्ववत   हो  जाना  मानव  मात्र  के  लिए  ये सन्देश

है कि कितना  भी  प्रतिकूल  परिवेश  क्यों  न  हो , धैर्य  के  साथ  अपने अस्तित्व की रक्षा करते  हुए  मनुष्य  पुनः  अपने 

सामर्थ्य  को  प्रतिस्थापित  कर  सकता  है |

टीस

 

छला गया मैं कदम कदम पर

इसका कोई अफसोस नहीं

अपने ही जब घात करें तो

कौन गलत और कौन सही

निर्मल निश्छल अंतर्मन से

सदा निभाया सबका साथ

उलझे रिश्तों को सुलझा कर

आगे बढ़ कर थामा हाथ

जिन लोगों पर किया भरोसा

साथ छोड़ कर गए वही

काश कोई मन को भी सुनता

आज भी दिल में टीस यही………..    

हे जगदम्ब भवानी

 

जय जय हे जगदम्ब भवानी !

जय जग जननी मात दयानी

अखिल विश्व की पालक तुम हो

असुर शक्ति संहारक तुम हो

सुर जन मुनि सेवित ब्रह्मानी

जय जय हे जगदम्ब भवानी !

हे  रुद्राणी  शिव  पटरानी

आदि शक्ति तुम शैलपुत्री हो

ब्रम्हचारिणी  महातपा  हो

कृपा करो हम पर कल्याणी

जय जय हे जगदम्ब भवानी !!

साकार

 

श्मसान व्यस्त है ,स्वान दल भी मस्त है

नैतिकता निराश है ,प्रजातंत्र भी पस्त है  

मदांध   शक्तियां   कर  रहीं  हैं  तांडव

अज्ञात  प्रछिप्त  वास  कर  रहे हैं पांडव

कौरवों  के पाश  में  प्रान्त, पुर उदास है

रक्त  रोज  बह  रहा पर अतृप्त प्यास है

समय  लगाये टकटकी  देख रहा आस  है

व्यवस्था में व्याप्त एक सुलगता अहसास है

करें नवीन  कल्पना ,करें नवल विचार हम 

सत्य  का हर स्वरुप करें अब साकार हम !!!


गुनगुनाएं उन क्षणों को

 

गुनगुनाएं उन क्षणों को

हुआ जब जब मन ये पुलकित ,  

काल कवलित हुए जो पल

करें उनको अब विसर्जित |

कमल हो चाहे कुमुद हो

नियति से हो रहे पुष्पित ,

कर्म कर के ही मिलेगा

पायेगा नर मनोवांछित |

बचे पल हैं और कितने

सोचता मन थकित चकित ,

उठो ,दो आवाज़ नभ को

बन सकोगे जगत वंदित !!!!

कौन यहाँ सुननेवाला

 

किसे सुनाऊं मन की अपने  

कौन यहाँ सुननेवाला !

रिश्ते नाते फटे हुए हैं

नहीं कोई सिलनेवाला

यूँ तो बस्ती भरी पड़ी  है

पर छाया है वीराना

कहने को अपने  हैं लेकिन

मिलते  जैसे अनजाना

होड़ हाय की लगी है ऐसे

लगा दिया खुद पर ही दांव

भूल गए जब चला सिकंदर

गया बेचारा खाली  पांव !

नहीं समझ में आता मेरे

कैसा ये गड़बड़झाला

मन से बहरे बने हुए हैं

नहीं कोई सुननेवाला !!

 

बैठक

 

संवेदन शून्यता की पराकाष्ठा है या विडम्बना

गरीबी अपनी परिभाषा सुन कर शर्मा जायेगी

क्या फर्क पड़ता है आयोग के चिंतकों को

बेशर्म चेहरों पर शिकन क्यों कर आएगी !

टी.वी चैनलों पर खूब गाल बजाते हैं

वातानुकूलित परिवेश में पसीना बहाते हैं

पांचसितारा लंच के बाद स्वीट डिश फरमाते हैं

किसी गरीब के पेट का ख्याल क्यों आयेगा !

बैठकों से गरीबी तो नहीं मिट पायेगी

मगर बेचारा गरीब जरुर मिट जायेगा !

कागजों पर पुल सड़क और बाँध बनाते हैं

कमाल के बाजीगर हैं सत्ता के ठेकेदार ,

कागजी आंकड़ों से गरीबी कम करके दिखाते हैं !

ये भूख की आग में जलते गरीब को तापते हैं

मानवीय संवेदनाओं से बहुत ऊपर उठ चुके हैं

तभी तो ये नीति निर्धारक थिंक टैंक कहलाते हैं !!!!    

चिंतन

 

कालबद्ध  दिनचर्या  के  चक्रव्यूह  को  भेदने का प्रयास करता मनुष्य इस चिरंतन

और शाश्वत सत्य को  कैसे  विस्मृत  कर  देता  है  कि  सृष्टि  और संहार ,सृजन

और विनाश ,उत्थान और पतन का चक्र अनवरत घूमता रहता है | एक अगम्य ,

अदृश्य और असीम सत्ता किस सूक्ष्मता से जीवन के  अजस्त्र प्रवाह को नियंत्रित

और निर्देशित कर रही है ,यह क्षणिक अनुभूति भी स्वतः ही उसके प्रति समर्पण

की  परिस्थितिओं  का  सृजन  करने  लगती  है | अव्यक्त  और अज्ञात चेतना के

स्वरुप  का  चिंतन  और अन्वेषण शनैः शनैः मनुष्य को एक पूर्णता के परिवेश की

ओर खींचे लिए चला जाता  है  और  इस  विचार  यात्रा  में  अग्रसर  होते प्राणी  के

अंतःस्थल में परमानन्द की अनुभूतियों का प्रस्फुटन होने लगता है |

अविजित संदर्भ

 

हैं अभी संदर्भ अविजित

कल्पना भी  है अधूरी,

बादलों के पार झांको

तय अभी करनी है दूरी |

व्योम के विस्तार में कुछ

प्रश्न हैं आवाज़ देते,

क्षितिज को है नापना फिर  

अभी क्यों विश्राम लेते !

क्षीर सागर ,शेष शय्या

कमल दल पर हैं विराजित,

हिमशिखर के जो हैं अधिपति

कर्म सब उनको समर्पित |

सत्य पौरुष है तुम्हारा

भागीरथ का अंश हो तुम,

विफलता जो भी मिली हो

आज कर दो सब विसर्जित |

हैं अभी संदर्भ अविजित ……….