विरह व्यथा

 

पूर्णिमा की प्रभा बिखरी  

सितारे कर रहे झिलमिल

शरद की स्निग्ध संध्या

चंद्रमा हँस रहा खिलखिल

टकटकी कैसी लगी है

खोजती है दृष्टि किसको

नृत्य करती रश्मियाँ ये

रिझाती न जाने किसको ?

चुभ रही है चाँदनी ये

बिन पिया भाए न रजनी

विरह बादल कब छ्टेगें

सोच में डूबी है सजनी

आ भी जाओ कंत मेरे

दग्ध मेरा तन बदन है

बरस बीते अब तो बरसो

असहनीय अब अगन है ………

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जीवन सपना खेल खिलौना

 

जीवन सपना खेल खिलौना

ख्वाब टूटते स्वपन बिखरते

चकाचौंध में जगते सोते

अनायास ही हँस पड़ते तो

कभी हिचकियाँ भर कर रोते

जगी हुई आँखों का सोना

जीवन सपना खेल खिलौना

कभी जीत का जश्न मनाते

कभी हार को पचा न पाते

गलत चाल पड़ जाती कोई

खेल भावना भूल हैं जाते

जीत के खोना हार के पाना

जीवन सपना खेल खिलौना

उत्सुक आतुर व्यग्र चित्त हो

अपने इच्छित को अपनाना

सजग सशंकित कौतुहल से

लालायित नज़रों से बचाना

कभी तोड़ना कभी जोड़ना

जीवन सपना खेल खिलौना

फाँस

 

करें शर संधान पर

लक्ष्य पर कैसे लगे ?

सो गया देवत्व जो अब

नींद से कैसे जगे ?

करें हम किसका दहन

लायें कहाँ से विभीषण ?

कुम्भकर्णी व्यवस्था में

दशानन ही दशानन !

न ही वो रणक्षेत्र है

न जानकी को आस है

राम के सामर्थ्य पर

कैसी लगी ये फाँस है ?????

महिषासुरमर्दिनी

 

महिमामयी महिषासुरमर्दिनी

अभय अतुलनीय स्नेह सुधा दो

शरणागत तेरी हे माता

अंध कूप है प्रग्य प्रभा दो

सिद्धिदात्री हम संतति तेरे

क्षमा करो अपराध हमारे

दुर्गा दुर्गति नाश करो माँ

कौन हमारा सिवा तुम्हारे

हे करुणामयी हे भवमोचिनी

भव बंधन से मुक्ति हमें दो

सदा बसो तुम मेरे मन में

ऐसी अविचल भक्ति हमें दो …..  

कई दिनों से

 

कई दिनों से सोच रहा हूँ

किस से बांचूँ अंतर अपना

किस क्षण को फिर से दोहराऊं

फिर से कौन से पन्ने पलटूं

कौन सा मुखड़ा सुर में गाऊं

भुला नहीं पाता हूँ बचपन

यौवन में संतोष कहाँ है

संबंधों की उहापोह है

छोड़ किसे ,किसको अपनाऊं

अस्ताचल की ओर बढ़ रहा

साये क्रमशः गौण हो रहे

तैयारी में कमी नहीं है

क्या बांधूँ  क्या छोड़ के जाऊं

कई दिनों से सोच रहा हूँ ……….

महासमर

 

हँसता बचपन मौन बुढ़ापा

मद मस्ती से भरी जवानी

खंडित स्वप्न बिखरती आशा

हर जीवन की यही कहानी

किधर से आये कहाँ है जाना

समय कर रहा है मनमानी

कोई दृष्टि गयी है पथरा

कहीं उतर आया है पानी

कैसी तृष्णा ,कौन सी तुष्टि

वह विराट हम हैं अज्ञानी

महासमर में कूद पड़े जब

हमें नहीं मुंह की है खानी ………………..

जमूरा

 

आस्था है ,अस्मिता है

अदम्य वो अहसास है

मनुज की हर गम्यता में

व्याप्त वो विश्वास है

वो खड़ा नेपथ्य में

तब पल ये पूरा है 

कर रहा करतब वही

नर तो जमूरा है ……

जमात

 

रिश्ते ,नाते ,भावनाएं और अहसास

जब लगने लगें बिलकुल बकवास

तथाकथित माया के बंधनों को तोड़

अतीत से मुंह लो जब मोड़

जब आदर्शों से न रह जाये कोई सरोकार

मित्रों से ज्यादा भाने लगे चाटुकार

अपने कुछ होने का होने लगे अहसास

जीवन का ध्येय हो केवल भोग विलास

जब हर प्रश्न गुजरे नागवार

व्यभिचार भी लगने लगे सदाचार

भाव भंगिमा से झलके अहंकार

जब लगे कि आलिम फाजिल हो गए हो

लोग आप ही समझ लेगें कि

तुम नेताओं की जमात में शामिल हो गए हो !