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शाश्वत सत्य

शाश्वत सत्य

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जब कोई गीत

 

जब कोई गीत गुनगुनाता हूँ जब कोई गीत

किसी को आसपास पाता हूँ

थके-हारे उनींदे से पलों को

मीठी सी छुअन से गुदगुदाता हूँ

स्वरों में खोजता हूँ कुछ अनकही बातें

सुरों में बसी हुई सुगंध कोई

लय की गूंज में डूब कर के

बुझ गए दीप कुछ जलाता हूँ

कोई मुखड़ा उभर के बार बार आता है

कई पलों को छेड़ता ,सहलाता है

उसी अहसास को फिर से जी सकूं शायद

यही सोच कर अंतरा दोहराता हूँ

जब कोई गीत गुनगुनाता हूँ …..

 

कब से आस लगाये हैं

 

स्नेहांगन में स्वप्न सरीखे

कुछ पल बिखरे पाए थे

पता नहीं उसर जमीन पर

कोंपल कब उग आये थे

विस्मृत चाहत दस्तक देती 

शांत खड़ी प्रत्याशा में

आमंत्रण देता सम्मोहन

नयनों की जिज्ञासा में

शांत सतह पर कैसी हलचल

किसने बंशी लगाई है

मन मछली को क्या समझाएं

सत्य है या परछाई है

उहापोह है असमंजस है 

फिर से बादल छाये हैं

अबके अंतर भीगे शायद

कब से आस लगाये हैं ………..

विरहन

 

आये ना श्याम गिरिधारी

बाट तकत हैं सब सखियन संग

श्री वृषभानु दुलारी

काहे निष्ठुर बने कन्हैया

व्याकुल राधा प्यारी

श्याम दरस को तरसे नैना

कृपा करो हे मुरारी

कहें राधिका सखी विशाखा

अबके दूंगीं गारी

कान्हा संग चित ऐसो लाग्यो

सुध बिसरे ब्रज नारी     

आये ना श्याम गिरिधारी

 

 

 

ब्रज की गली गली में

 

ब्रज की गली गली में

गूंजे है नाम तेरा

अपना बना लो मुझको

तू ही तो प्राण मेरा

अब तो तेरे शरण बिन

मेरी गति नहीं है

सुध हर लिया है तुमने

अब न मेरी मति है

सुन लो सलोने बांके

मेरा नहीं है अब कुछ

हे राधे  श्याम सुन्दर

सौंपा है तुझको सब कुछ

भटकूँ इधर उधर मैं

खोजूं ठिकाना तेरा

अब प्रभु मुझे उबारो

बिन तेरे कौन मेरा

ब्रज की गली गली में

गूंजे है नाम तेरा

 

शुभाशीष

 

तू मेरा प्रतिरूप ,तुझमें

देखता हूँ अपनी छाया

तेरी निश्छलता में मैंने

अपना खोया समय पाया

ऊँगली पकड़ी ,हाथ पकड़ा

अब तो कंधे को मिलाता

गुजरते वसंत जाते ,

कुछ नये सपने सजाता

हो रहा गंभीर अब तू

मौन से कहने लगा है

छोड़ बचपन का किनारा

धार में बहने लगा है

देखने कई रंग तुझको

वक्त को ललकारना है

विघ्न तो आयेगें अक्सर

नहीं तुमको हारना है  

मेरी पूजा ,कर्म मेरा

तुझसे ही फलीभूत होगा

सफलता तुझको मिलेगी

मेरा पुण्य प्रभूत होगा………

 

शुभेक्षा

*

नित नूतन संकल्प करें  

सन्दर्भ नए साकार करें

नव गति ,नवल विचारों को ,

मुक्त ह्रदय स्वीकार करें

ज्ञान प्रकृति है ,ईश हैं उदगम  

तत्व को अंगीकार करें

मंगलमय हो हर क्षण जीवन

शुभेक्षा स्वीकार करें……….

             **

यूँ ही हंसता रहे ये सावन

हर लम्हा मनभावन हो

प्रमुदित मंगलमय हर क्षण हो

विजय हमेशा आँगन हो

यशः कीर्ति दानशीलता

सुख समृद्धि और सम्मान

सदा आपकी श्री वृद्धि हो

यही कामना है श्रीमान……..

              ***

नित खेलो तुम नई बाजियां

जीत तुम्हारे आँगन हो  

प्रिय जनों का सदा साथ हो  

न विरह का सावन हो

खिली रहे मुस्कान हमेशा

आगत सब मनभावन हो

चाहे जितने बाँटो नित दिन

पत्ते पूरे बावन हो……..