समय के साथ

समय के साथ चलते – चलते अब थकने लगा हूँ 

अथक प्रयासों के बावजूद

अक्सर कहीं खो जाता हूँ

इस भ्रम में कि जाग रहा हूँसमय के साथ

जाने कब सो जाता हूँ

संबंधों की आंच में अब पकने लगा हूँ

समय के साथ चलते – चलते अब थकने लगा हूँ

ऐसा नहीं है कि निराश हो गया हूँ

भविष्य को ले कर उदास हो गया हूँ

तपती दुपहरी में भी खूब चला हूँ

पूस की रातों में ठिठुरा हूँ, गला हूँ

चेहरों को पढ़ते – पढ़ते अब अटकने  लगा हूँ

समय के साथ चलते – चलते अब थकने लगा हूँ

स्पर्धा की तपन महसूस करता हूँ

चलन से विचलन महसूस करता हूँ

एक समय था जब जुड़ाव था, विस्तार था

रिश्ते सारे नगद थे, ना कोई उधार था

अपने आप में अब सिमटने लगा हूँ

समय के साथ चलते – चलते अब थकने लगा हूँ

ओस में भीगने का मन करता है

रेत पर चलने का मन करता है

दौड़ना चाहता हूँ खेत की मेड़ों पर

चढ़ना चाहता हूँ आम के पेड़ों पर

शहर में अपने आप से अब कटने लगा हूँ

समय के साथ चलते – चलते अब थकने लगा हूँ…..

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कई बार

 

कई बार दर्पण को देखाकई बार

कई बार कुछ गाया भी

कई बार झुठलाया सब कुछ

कई बार जतलाया भी

कई बार सब नाता छोड़ा

कई बार निभाया भी

कई बार गुब्बारा छीना

कई बार धमकाया भी

कई बार रूठा अपनों से

कई बार ठुकराया भी

कई बार की हँसी ठिठोली

कई बार बहलाया भी

कई बार जा बैठा गुमसुम

कई बार समझाया भी

कई बार उलझा प्रश्नों से

कई बार था पाया भी

कई बार था स्वांग रचा

कई बार ईठलाया भी

कई बार प्रस्फुटित हुआ

कई बार कुम्हलाया भी

कई बार सब भूल के देखा

कई बार अपनाया भी

कई बार बस डूब गया और

कई बार उतराया भी

कई बार सब पा कर खोया

कई बार सब पाया भी

कई बार जा कर के देखा

कई बार फिर आया भी

कई बार बस कई बार

बार बार फिर कई बार …

लगे तो ऐसी

 

अलग लगे या लगे अलग लगे  तो ऐसी

पर लगना बहुत जरुरी है

स्वयं लगे तो बात नहीं कुछ

सबको  लगना  जरुरी है   

लगे लगन जब अंतर्मन से

तभी समझना पूरी है

लोचन लगना क्या लगना है

मन लग जाय जरुरी है

लगी रहे जब तक प्रत्याशा

लगना एक मज़बूरी है

लगा लगी से जब लग जाये

लगे न कुछ भी अधूरी है

ऐसे लगने का क्या लगना

लगे जो जी की हजूरी है

लगे तो ऐसी लगन लगे

कि मिट जाये जो दूरी है ……….

जीवन

 

जीवन संग्राम ,समर्पण है

हर्ष ,श्रान्ति का दर्पण है2013-04-20-1595(0)(1)_Q1

आह्लाद है ये अवगुंठन है

निर्बंध है ये कभी बंधन है

ठहराव भी है चंचलता भी

संताप है ये शीतलता भी

आलाप है ये विलाप भी है

वरदान कभी अभिशाप भी है

आनंद भी है आताप है ये

प्रकृति का पुण्य प्रताप है ये

ये गीत भी है कभी कविता भी

कभी भरा हुआ कभी रीता भी

कभी उदासीन कभी आशा है

एकांत कभी ये तमाशा है

कभी लोभ मोह कभी ईच्छा है

कभी दग्ध ह्रदय की प्रतीक्षा है

अदम्य है ये दुर्गम्य है ये

अपराध कभी ,कभी क्षम्य है ये

कभी विरह ,मिलन ,आलिंगन है

अभ्यर्थन है अभिनन्दन है

पल पल होता परिवर्तन है

जीवन प्रकृति का नर्तन है

कभी तेजोमय ,प्रचंड ,प्रखर

लगता सर्वस्व कभी नश्वर

कभी फूल रहा कभी धूल रहा

अनुकूल कभी प्रतिकूल रहा

सम्मोहन है एक सपना है

अब जैसा भी है अपना है

अब जैसा भी है अपना है ……..

उत्कर्ष

 

क्या हुआ जो सपने टूट गए

कुछ स्वर्णिम अनुभव छूट गए

बीत गया पहला खुमार

हुआ शांत वो अदम्य ज्वारउत्कर्ष१

चलते चलते जो लगी ठेस

उद्विग्न कर गया कोई क्लेश

मंजिल जब दिखने लगी दूर

नियति भी लगने लगी क्रूर

ये क्रम तो चलता जायेगा

पौरुष को रोक न पायेगा

आओ मिल कर संघर्ष करें

निज उन्नति, उत्कर्ष करें …….

गलियारा

 

baajiकभी समय के गलियारे में

ताका – झांकी कर लो तुम

भूली बिसरी उम्मीदों से

दो पल बातें कर लो तुम

पता नहीं कब साँझ ढले

कब काया माया छोड़ चले

दुनियादारी ,रिश्ते – नाते

सब बंधन को तोड़ चले

पाना खोना हँसना रोना

ये तो रीत पुरानी है

मेला यूँ ही लगा रहेगा

भीड़ तो आनी जानी है

हर क्षण उसकी कृपा बरसती

अपने हाथ पसारो तुम

बाँटों जितना भी हो पाए

जीती बाजी हारो तुम …..

 

बादल

 

वक्त की कारीगरी केDSCN0870

हम सदा कायल रहे

कभी गरजे कभी बरसे

भटकते बादल रहे

नीर भर कर भी चले हम

हवाओं से हम लड़े

जब भी मौक़ा हाथ आया

नदी नाले सब भरे

कौन रोया कौन गाया

किसने दी हमको दुआ

कभी सूरज को छुपाया

कभी शिखरों को छुआ

त्रासदी का दंश भोगा

दिल से हम घायल रहे

वक्त की कारीगरी के

हम सदा कायल रहे …….

  

अल्हड़ मस्त फकीरा मन

अल्हड़ मस्त फकीरा मन

 

अल्हड़ मस्त फकीरा मन

अपनी धुन में रमा हुआ

क्या खर्चा क्या जमा हुआ

बाँट रहा बस अपनापन

अल्हड़ मस्त फकीरा मन ….

 आनी जानी लगी हुई

ठिठकी साँसें ठगी हुई

माया ममता का बंधन

अल्हड़ मस्त फकीरा मन ….

लगी हुई एक भागमभाग

धुआँ है पसरा नहीं है आग

धन दौलत तृष्णा यौवन

अल्हड़ मस्त फकीरा मन ….

 घटता जाता है तिल तिल

अब भी ओझल है मंजिल

साज श्रृंगार  रहे बन ठन

अल्हड़ मस्त फकीरा मन ….

जब कोई गीत

 

जब कोई गीत गुनगुनाता हूँ जब कोई गीत

किसी को आसपास पाता हूँ

थके-हारे उनींदे से पलों को

मीठी सी छुअन से गुदगुदाता हूँ

स्वरों में खोजता हूँ कुछ अनकही बातें

सुरों में बसी हुई सुगंध कोई

लय की गूंज में डूब कर के

बुझ गए दीप कुछ जलाता हूँ

कोई मुखड़ा उभर के बार बार आता है

कई पलों को छेड़ता ,सहलाता है

उसी अहसास को फिर से जी सकूं शायद

यही सोच कर अंतरा दोहराता हूँ

जब कोई गीत गुनगुनाता हूँ …..