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ज्योतिपर्व

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कभी तो होगी भोर

 

सुलग रहीं आशाएं  ,अरमां दरक रहे

बिना पिये  ही लोग आजकल बहक रहे

मन में भरा गुबार ,घड़ा भर आया है

जली हुई है आग अंधेरा छाया है

कौन सुने फरियाद बहाए आँसू कौन

कोलाहल बाहर पसरा है ,अंदर मौन

नहीं सूझती राह कोई, मन भरमाया

सूख चुके हैं अश्रु नहीं कोई सरमाया

देवालय में बंद प्रभु भी पस्त हुए

चला रहे दुकान सब अपनी मस्त हुए

रखो कदम संभाल मरीचिका मृगनयनी

कैसी भी कर लो करनी पर है भरनी

रवि हुए असहाय ,असमय ग्रसित हुए

देख रहे व्यापार नयन द्विग्भ्रमित हुए

नहीं रहा वो चाँद खोजता जिसे चकोर

कट जायेगी रात कभी तो होगी भोर ……