नयी शुरुआत

 

बीती बातें बिसर के आओ

वर्तमान से बात करें

आज को समझें ,अभी को जानें

एक नयी शुरुआत करें

गया जमाना कब लौटा है

चला गया जो उसका क्या !

आने वाला समय कह रहा

हर पल को सुर लय में गा

समय का जो सम्मान करोगे

मेहनत को अपनाओगे

आने वाले कल को अपने

सुखद बना तुम पाओगे ….

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तेल का खेल

 

तेल देखो ,मत तेल की धार देखो

जेब कैसे काटती है सरकार देखो

नेताओं को तेल कितना भी लगाये जनता

पीठ पीछे करते हैं ये वार देखो

तेल तो निकाला जायेगा तिलों से ही

आम आदमी से ये कैसा सरोकार देखो

तेल की चिंता में जनता रात रात भर जागेगी

अस्मिता को तलाशती जिंदगी कैसे भागेगी

न नौ मन तेल होगा ,न राधा नाचेगी  ……….  

 

ढाई आखर

 

कई लम्हों को समेटे नयन मूंदे रह गए

समय की धारा के साथ साथ बह गए

सुन लिया चुपचाप सबको जो कहा जिसने कहा

चोट कितने भी लगे बिना शिकवा सब सहा

बनी रहे सुगंध रिश्तों में मधुर आभास हो

एक दूजे के प्रति सम्मान का अहसास हो

बनाना आसान है पर रखें हम संभाल कर

त्रासदी हावी न हो सके किसी ख्याल पर

आन में अलगाव है जुड़ाव है अपनत्व में

ढाई आखर प्रेम के यह सोच सब कुछ सह गए ………..

बहाना

 

जब आमदनी अठन्नी ,खर्चा हो रुपैया

तो तुम्हीं बताओ क्या हाल होगा भैया

कहाँ से मिल पायेगा सबको पूरा माल

नतीजा तो निकलेगा ही ठन ठन गोपाल

रोज बढ़ती महंगाई नए घोटाले और भ्रष्टाचार

देश की दशा और दिशा का कर रही है बंटाधार 

पेट्रोल का दाम बढ़ाना तो एक बहाना है

वो तो “कल्याण योजनाओं” के लिए फंड जुटाना है

रोम में लगे आग तो लगे, कौन बुझायेगा ?

वो नेता ही क्या जो चैन की वंशी नहीं बजायेगा !

भ्रष्टाचार

 

 

जैसे अधिक जोगियों के जमा हो जाने से

बड़े से बड़ा मठ भी हो जाता है उजाड़ ,वैसे ही

जो सरकार में अर्थशास्त्रीयों की हो जाय भरमार

तो देश की अर्थव्यवस्था का होता रहेगा बंटाधार

जब सरकार चलायेगें विशेषज्ञ और सलाहकार, और

खादी और खाकी की सहमति से पलेगा भ्रष्टाचार

घोटालों के लिए फंड का होने लगेगा अभाव

तो यूँ ही बढ़ा दिया जायेगा पेट्रोल का भाव 

अहंकारी और चाटुकार सत्ता पर काबिज रहेगें

देश की समृद्धि को दीमक की तरह खाते रहेगें

जब सैयां भये कोतवाल तो डर काहे का होगा

रुपया तो अपनी इज्जत को यूँ ही रोता रहेगा

जिसको मिलेगा मौका यूँ ही हाथ धोता रहेगा

आम आदमी जीने की कोशिश में रोज़ मरता रहेगा ……

 

सिसकते संबंध

 

सप्तपदी का अहसास ,मेहँदी का रंग 

सुहाग की सेज ,स्नेहिल उमंग

समर्पण का क्षण ,कांपते नयन

जन्म जन्मांतर का अद्भुत बंधन

निबाह निःशेष,अहम का प्रवेश

हर पल लगती मन को एक ठेस

उपेक्षा की यंत्रणा में सिसकते सम्बन्ध

विश्वासघात की त्राशदी को कब तक झेल पायेगें !

तिल तिल कर मरती भावनाएं

रिश्तों को असमय ही भस्म कर जायेगें ……

हर चाहत को ठुकराया है

 

अपने को पाने की खातिर

खुद पर दांव लगाया है

जीती बाजी छोड़ के हमने

हार को गले लगाया है

किया किनारा अपनों से

बेगानों को जोड़ लिया  

बड़े जतन से अर्जित कर के

दोनों हाथ लुटाया है

रंग बिरंगे चेहरे देखे

अदब कायदे देख लिए

देख लिया बन बड़े लोग

अब जनजीवन अपनाया है

चकाचौंध से निकल के हमने

गुमनामी का साथ किया

चाहत पूरी करने की

हर चाहत को ठुकराया है…….

प्रण

 

नज़र करने लगे शिकवा  

ख़ामोशी सुनने लगे

बेतहाशा भागती रफ्तार  

भी थमने लगे

सर्द होती वेदनाएं

ज्वार बन बहने लगे

मौन भी जब फुसफुसा

अपनी व्यथा कहने लगे  

दिलासा अधीर हो कर

धैर्य से लड़ने लगे

अधूरी अतृप्त चाहत

असमय मरने लगे

एक तिनका उठा लेना

करना बस इतना ही प्रण

समय को है जीतना

है विजय को करना वरण !

भोर का तारा

 

टूटते तारे से पूछो ,

डूबने का दंश है क्या !

गगन को चिंता है किसकी ?

हर है क्या और अंश है क्या !

क्रम यूँ ही चलता रहेगा

जुडेगें कुछ छोड़ देगें

नए आशियाने बनेगें

कुछ पुराने तोड़ देगें

गूंज उनकी ही रहेगी

सुर में लय में जो बजेगें

बिना बाती ,तेल के बिन

कौन से दीपक जलेगें ?

फलक पर जब तक टंगे हो

पूरी क्षमता से चमकना ,

भटके हुए हर पथिक की

भोर का तारा तुम बनना !

डूब कर भी आभ तेरी

अनछुई रह जायेगी ,

याद रखेगी ये दुनिया ,

तेरी कसमें खायेगी ……

आम आदमी

 

जेठ की तपती दुपहरी में

श्यामल कृशकाय काया को

वातानुकूलित कोठी की दीवार के साये में

बची खुची शीतलता की तलाश है

अखबार में लिपटी सूखी रोटी

दो प्याज के टुकड़े , थोड़ा सा नमक भी है

पुरानी सी प्लास्टिक के बोतल का पानी

बूंद दो बूंद बचा हो शायद

पर आँखों में जीवन की प्यास है

ताप इतना कि पसीना भी

भाप बन कर उड़ जाता है

पर अब वह बेफिक्र

ईंट पर सर रख कर

एक तरफ पड़ जाता है

बगल वाली चाय की दुकान पर

अचानक चली गयी नजर

ब्लेक एंड व्हाइट टी.वी पर

नेता जी टॉक शो में

बहस करते विरोधी पार्टी पर

लाल पीले हो रहे हैं

देश के आम आदमी की दुर्दशा पर

भ्रष्टाचार और लालफीताशाही का

रोना रो रहे हैं

टी.वी पर समाज के अंतिम आदमी को

उठाने का प्रयास बुद्धिजीवीयों द्वारा  

पूरी गंभीरता से हो रहा है

पर इन सबसे बेफिक्र

वह आम आदमी आधा पेट खा कर भी

चैन की नींद सो रहा है …….