जागो

 

साँसे गिन रहा लोकतंत्र  

गहमागहमी ये कैसी है ,

जनता सपने पाल रही है  

खुशफहमी ये कैसी है !

सत्ता के काले गलियारे

बिछा गलीचा लाल हुआ ,

कौन जानता किस कारण से

कैसे वो बेहाल हुआ !

परदे के पीछे की बातें

खुलेआम आम अब होती हैं ,

दोष और का देना क्यों

जागी आँखें जब सोती हैं !

आज़ादी का गीत दोस्तों

कब तक गाते जाओगे ?

डूब रहे सूरज को लोगों

कब तक झुठला पाओगे ?

गए दिनों की गौरव गाथा   

बंद करो अब रटना तुम !

दरक रही आशाओं को

एक नवल छंद में रचना तुम ………….

 

क्या सुनाऊं

 

क्या सुनाऊं दिल की बातें

कौन है ,किसके लिये

हम जिए जाते हैं यूँ ही

 क्या पता किसके लिये

किस को फुरसत है ए लोगों

कौन सोचे और को

कैसी है ये दुनियादारी

दौड़ है किसके लिये

खो गए सब इस कदर हैं

अपना सब कुछ भूल कर

लगी ये कैसी लगी है

ये तमाशा  किसलिए

चलो ढूढें वजह कोई

दिल को जो बहला सके

कुछ न कुछ तो करना होगा

इसके या उसके लिये ……….

सोचता हूँ क्या था वो

 

वेदना का चरम था वो

स्वपन का संसार था

प्रकृति प्रदत्त था वो

स्नेह का उपहार था

समय का संवेग था वो

सत्य निराकार था

संयोग वियोग था वो

मिलन एकसार था

प्रतीक्षा का प्रहर था वो

अद्भुत अभिसार था  

क्षण का उन्माद था वो

समर्पण का सार था

सोचता हूँ क्या था वो

क्या वही प्यार था !!!

कैसी अद्भुत है ये माया

 

कैसी अद्भुत है ये माया  !

हर पल कोई आता जाता

कहीं शोक में डूबा मन

महफिल में कोई है गाता

नियति की मर्जी से जीवन

खिलता एक पल फिर मुरझाता

हर क्षण क्षय के जाता करीब

तन के यौवन पर इतराता

जननी को विस्मृत कर देता

अनजानों से जुड़ता नाता

बाहर सब पर कर विजय प्राप्त

अपनों से ही मुंह की खाता

कालचक्र की गति ऐसी

याचक बन जाता है दाता

लिखने वाला इतिहास कभी

अपना ही लेख न पढ़ पाता

हर क्रिया में सत्य समाहित है

मन को न नर समझा पाया

कैसी अद्भुत है ये माया  !

सपनों का अब क्या करना

 

अक्सर पूछा करते खुद से

कौन हो तुम और कौन हैं हम

अपनी दुनिया में तुम खोये

जीते हैं हम अपना गम

नहीं चाहता सोचूँ तुमको

पर ये है कैसा बंधन

नयन मूंद मैं देखा करता

अधमूंदे  दो  तेरे  नयन

कभी किलकती कभी बिलखती

बलखाती मदमाती सी

जैसे संचित कर्म कोई हो

पूर्वजन्म की थाती सी

छोड़ो अब ये और नहीं

एक पल जीना एक पल मरना 

बहुत हो गई लुका छिपी

सपनों  का अब क्या करना  !!

कोई बात बने

 

बना  लेना  दोस्त चाहे सारे जमाने को अपना

निबाह कर सको जो  दोस्ती तो कोई बात बने

अफसाने मोहब्बत के सुन लो सुना लो कितना

रखो ख्याल जो जज्बात का तो कोई बात बने

चमन में अबके मौसम बहार का झूम कर आया

गुलों पे छा जाय जो रंगत  तो कोई बात बने

भर  लो झोली में अपने लाल जवाहर कितने

जरूरतमंद को निभा  सको तो कोई बात बने

वो हमसे कहते हैं कोई तुमसा नहीं अपना ‘दिव्यांश ‘

साथ जो दो कदम चल सकें तो कोई बात बने

मौन जब गाने लगा था

मौन  जब गाने लगा था

व्योम के विस्तार में हम डूब उतराने लगे थे

पास बैठे थे सिमट के फिर भी अनजाने बने थे

देखती तुम रही अपलक अश्रु बिंदु दृग ढले थे

अचानक  क्या हुआ था फेर के मुख तुम चले थे

मैं बना असहाय कातर थाम न पाया था आँचल

न ही बन पाया पवन मैं उड़ा ले जाता जो बादल

कैसा था उफान उफ वो दम घुटा जाता था हर पल

जानती हो किस तरह से रोक पाया था मैं खुद को !

कितने टुकड़ों को समेटा तब जुटा पाया था संबल

फासले मिट गए थे जब प्यार सहलाने लगा था

चांदनी पसरी थी शीतल मौन जब गाने लगा था ………..

शायद फिर

 

शायद आज तुम फिर आओगी एक बार

आशाओं की बरगद के छांव तले

मैं करता रहूँगा इंतज़ार

उसी वर्तमान के चबूतरे पर

जिस पर कई बार पाया है

मैंने तुम्हें  तुम्हारी संपूर्णता में

निगाहें बिछी सी हैं

चौंक उठती हैं  हरेक साये पर

इस भ्रम में कि हर धुंधला साया

तुम्हें अपने में समेटे हो शायद

मगर वो शायद तुम नहीं

मेरी अभिलाषाओं की परछाई मात्र हो

और मैं हवा की चादर पर

खींचता जा रहा हूँ

आकांक्षाओं की लकीर 

जो धुंआं सा बन कर

उठ रहा है कहीं अंदर से

और हर सांस के साथ

बिखेर दे रहा है सपनों को

मगर न जाने क्यों ऐसा लगता है

कि शायद तुम फिर ………….  

प्रेम

 

जीवन  और  मृत्यु  की  भांति प्रेम भी एक शाश्वत सत्य है | अनेक परिस्थितियों   और चरणों  में  प्रस्फुटित  होती  यह 

पवित्र   भावना  स्वतः  स्फुरित  होती  है |

                      प्रेम न बाड़ी उपजै ,प्रेम  न  हाट  बिकाय

                      राजा  प्रजा  जेहि रुचै शीश देई लय जाय

प्रेम  में  आबद्ध  व्यक्तित्व  स्वयं  को समर्पण की धारा के हवाले कर देता है ,

एक  ऐसी  परिस्थिति  का  निर्माण  होने  लगता है जहाँ अहम का विलोपन ,

चैतन्यता  को  जाग्रत  कर एक नैसर्गिक परिवेश का सृजन करने लगता है |

एक  ऐसा  परिवेश  जहाँ  अपेक्षाएं  न  तो  बाँधती   हैं और न तो बद्ध अनुभव

करती  हैं | कोई  शर्त  नहीं  कोई  विनिमय  नहीं ,होती   है  तो   केवल  एक  रागात्मक  अनुभूति  | एक  ऐसी  अनुभूति 

जो  सुन्दर  तो  है  पर  एक  अव्यक्त पीड़ा  की  जन्मदात्री  भी | प्रेम  की  पीड़ा   यदि  सत्य  है   तो  कटु  क्यों   नहीं ? 

शायद सत्य  को  सदैव  सुन्दर  कहा  गया   है ,इसीलिए  ? देह  और  नेह  का  सत्य  एक  दूसरे  से  एकदम   अलग  है |

आकर्षण का  क्षणिक  आवेश   जब  क्षण  के  प्रति  आत्म  समर्पण   को   बाध्य  कर   दे  तो   सत्य  और  तथ्य के  बीच 

का  द्वन्द अर्थहीन  प्रतीत  होने  लगता  है |जहाँ  एक  तरफ  एक  आदिम  भावना  अपने  तर्क  से  निरुत्तर करने  का 

प्रयास  करने लगती है  तो वहीं  दूसरी  ओर देवत्व  की   मर्यादा  याचक  बन  कर  सामने   आ   खड़ी  होती  है | प्रेम का 

सनातन  और शाश्वत सौन्दर्य ,सृष्टि  की  चिरंतन  धारा  में  प्रवाहित  होते  प्राणियों  को सदैव नैतिक  तथा  चारित्रिक  

उदात्ता  का  अनुभव  कराता  रहेगा  , इसमें  कोई  संदेह   नहीं ………..

सिमट जाने दो

 

सुरमई आँखों की स्याही में उतर जाने दो

अपने पहलू  में चुपचाप सिमट जाने दो

वक्त का दौर ऐसा भी  कभी आता है

डूब कर आदमी अपने को पा जाता है

अपनी यादों के समंदर में डूब जाने दो

अपने पहलू  में चुपचाप सिमट जाने दो

जिंदगी का ये सफर तो बहुत सुहाना है

घटती साँसों के सुर को मुझे सजाना है

हमसफर साथ तेरे मुझको भी आ जाने दो

अपने पहलू  में चुपचाप सिमट जाने दो …..