भ्रष्टाचार के कारण और समाधान

 भ्रष्टाचार

मानवीय अंतरसंबंधों के नियमन और सुव्यवस्थित निष्पादन के लिये हमारे मनीषियों ने गहन चिंतन किया जिसके फलस्वरूप कई नीति निर्धारक दिशा निर्देश अस्तित्व में आये | ‘मनु स्मृति’ से शुरू हुई इस विचार यात्रा में चाणक्य सरीखे चिंतकों ने सामाजिक और राजनैतिक संदर्भों पर प्रजा और राजा दोनों के ही कर्तव्यों पर प्रकाश डाला | कालक्रम में कई सुयोग्य शासकों ने अनुकरणीय सामाजिक और राजनैतिक समझ का परिचय देते हुए एक जीवंत, समृद्ध और स्थापित मूल्यों के प्रति जागरूक समाज की परिकल्पना को मूर्त रूप प्रदान किया | स्थापित मूल्यों से इतर आचरण ,भ्रष्टाचार को जन्म देता है | आचार ,विचार और व्यवहार यदि स्थापित मर्यादाओं  और मूल्यों की अवहेलना करें तो भ्रष्टाचार की उत्पत्ति स्वाभाविक है |

वर्तमान सामाजिक परिदृश्य में भ्रष्टाचार एक वैश्विक समस्या का रूप ले चुका  है | हमारा देश और समाज भी इस समस्या से अछूता नहीं रहा | भ्रष्टाचार रूपी दैत्य ने जीवन का शायद ही कोई ऐसा आयाम हो जिसे अपना ग्रास नहीं बनाया है | सामाजिक ,सांस्कृतिक ,आर्थिक ,राजनैतिक ,प्रशासनिक या शैक्षणिक ,सभी तंत्र इसके प्रभाव में अपनी अस्मिता को खोते चले जा रहे हैं | भौतिकतावादी संस्कृति से प्रभावित व्यक्ति येन केन प्रकारेण अर्थोपार्जन को ही जीवन का ध्येय मान लेता है | इस लक्ष्य को प्राप्त करने के प्रयास में मानक मूल्यों और आदर्शों को कब और कैसे विस्मृत कर देता है ,ये उसे जब तक अहसास होता है तब तक देर हो चुकी होती है | व्यक्तिगत स्वार्थ ,अदम्य अभिलाषाएं ,और विलासिता भरे जीवन की चकाचौंध उसे किसी भी आदर्श एवं नैतिक मूल्य यहाँ तक कि अपनी अंतरात्मा की आवाज के प्रति उदासीन बना देते हैं | यह सत्य है कि धन संपदा का उपार्जन एवं संचय  चिर काल से मानव मात्र के लिये जीवन का एक महत्वपूर्ण प्रसंग बना रहा है परन्तु आधुनिक सामाजिक व्यवस्था में यह अधिकांश व्यक्तियों के जीवन का एकमात्र अभीष्ट बन कर रह गया है | विज्ञान के विकास के साथ साथ पश्चिम और पूरब के बीच की दूरी सिमटती गई और पाश्चात्य सभ्यता के अंधानुकरण ने भारतीय सामाजिक संरचना में उपभोक्तावादी संस्कृति को सर्वोपरि और सर्वमान्य मूल्य का स्थान दे दिया | विगत तीन दशकों से आर्थिक सम्पन्नता को ही जीवन में सफलता का एकमात्र मापदंड मान लेने का चलन दिनानुदिन  बहुमत में आता दिख रहा है | समाज में  विलासितापूर्ण जीवन शैली का महिमामंडन जन साधारण  के शब्दकोष से संतोष ,परिश्रम ,कर्तव्य ,निष्ठा और ईमानदारी जैसे शब्दों को मिटा  देती हैं | धनोपार्जन की क्षमता से अधिक व्यय की परिस्थितियों में अधिकांश व्यक्ति अपनी नैतिकता को दांव पर लगा देते हैं | निर्विवाद रूप से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि भ्रष्टाचार का सबसे कारण धन लोलुपता है |

यदि हम चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ी इस सामाजिक कोढ़ से सुरक्षित रहे तो आज से ही इसका प्रभावशाली निदान तलाशना होगा | सर्वप्रथम पारिवारिक स्तर पर मानवीय मूल्यों का संवर्धन एवं संरक्षण सुनिश्चित करना होगा | प्रतिस्थापित सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति यदि बाल अवस्था से ही सम्मान का भाव जगाया जाय तो संभव है कि भ्रष्ट आचरण को त्याज्य समझने वालों के मनोबल में और दृढ़ता का संचार होगा | भ्रष्ट जीवन शैली और भ्रष्टाचारियों  का महिमामंडन  करने की बजाय सामाजिक बहिष्कार हो | सांस्कृतिक पुनर्जागरण की प्रक्रिया को जन आंदोलन का रूप दे कर ईमानदार और स्वच्छ छवि के लोगों को सामने आना होगा और जन साधारण के मानस पर छा गए भ्रष्टाचार के सम्मोहन को तोडना होगा | साहित्यकारों और समाज के सृजनशील व्यक्तित्वों को अपनी कृतियों से वह प्रकाश फैलाना होगा जो भ्रष्टाचार के अन्धकार को मिटा दे | समय आ गया है कि जन मानस इस बात का मंथन और चिंतन करे कि ,

                                                                पाता क्या नर कर प्राप्त विभव ?

                                           चिंता  प्रभूत अत्यल्प हास , कुछ चाक्य चिक्य कुछ पल विलास

                                            नर   विभव  हेतु  ललचाता  है , पर  वही  मनुज  को  खाता  है  |

यदि सनातन दर्शन , अध्यात्म और चारित्रिक शुद्धता के प्रति नैराश्यपूर्ण वातावरण से मुक्त समाज के निर्माण का संकल्प लेकर प्रयास किये जायें तो निश्चित रूप से आने वाली पीढ़ी एक भ्रष्टाचार मुक्त वातावरण में सांस ले सकेगी | आज यह अत्यंत आवश्यक हो गया है कि जन मानस निम्नांकित पंक्तियों में व्यक्त उदगार को अपने जीवन में चरितार्थ करने का प्रयास करे ;

                                                                       साई इतना दीजिए जामे कुटुंब समाय

                                                                         मैं भी भूखा न रहूँ साधू न भूखा जाय

इसमें कोई संदेह नहीं कि नैतिक,वैचारिक,आत्मिक और चारित्रिक पवित्रता ,भ्रष्टाचार के रक्तबीज का नाश करने में सक्षम होगी और एक सार्थक सामाजिक परिवेश का सृजन करेगी |

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लगे तो ऐसी

 

अलग लगे या लगे अलग लगे  तो ऐसी

पर लगना बहुत जरुरी है

स्वयं लगे तो बात नहीं कुछ

सबको  लगना  जरुरी है   

लगे लगन जब अंतर्मन से

तभी समझना पूरी है

लोचन लगना क्या लगना है

मन लग जाय जरुरी है

लगी रहे जब तक प्रत्याशा

लगना एक मज़बूरी है

लगा लगी से जब लग जाये

लगे न कुछ भी अधूरी है

ऐसे लगने का क्या लगना

लगे जो जी की हजूरी है

लगे तो ऐसी लगन लगे

कि मिट जाये जो दूरी है ……….