बंद मुट्ठी

साल का अवसान हो गया

कई यादों को समेटे,

कुछ सृजन के चित्र हैं

तो कुछ अधूरे स्वप्न टूटे |

काल का यह चक्र अविरत

नित नई मंजिल को पाता ,

प्रेरणा के स्वरों से

सोये प्राण को जगाता |

मधुर स्मृतियाँ समेटे

मुदित मन से गीत गाएं ,

दृढ़ प्रतिज्ञ आस्था से  

पूर्ण स्वरों में समाएं |

बंद मुट्ठी खोल ग्यारह

ले गया हमसे विदा है ,

बंद मुट्ठी लिए बारह

दे रहा हमको सदा है ……..

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पूछत हैं राधा प्यारी

ब्रज की हर इक लता से

पूछत हैं  राधा प्यारी

कित छुप गए हैं मोहन

माधव मुकुंद मुरारी

 

कानों में शोभे कुंडल

वैजन्ती की है माला

श्यामल सलोना मुखड़ा

शोभा है जिसकी न्यारी

ब्रज की हर इक लता से

पूछत हैं  राधा प्यारी

  

हाथन लिए हैं मुरली

गालों पे लट हैं बिखरी

अँखियाँ कहत हैं अब तो

दे दो दरस बिहारी 

ब्रज की हर इक लता से

पूछत हैं  राधा प्यारी

 

बस में नहीं है मेरे

मन हो गया है तेरा

सुध बुध नहीं है कुछ भी

जीवन मैं तुझ पे  वारी

ब्रज की हर इक लता से

पूछत हैं  राधा प्यारी

 

अब न सताओ नटवर

इतनी अरज है सुन लो

आ जाओ पास मेरे

ओ वृन्दावन बिहारी

ब्रज की हर इक लता से

पूछत हैं  राधा प्यारी

बारह में पौ बारह हो

बीत गए जो दिन भारी थे

आयें  जो  मनभावन  हों

नवल वसंत हो,गीत नए हों

कुसुमित कुंजन कानन हो

स्नेह की वर्षा में भींगो तुम

न  विरह  का सावन  हो

नित खेलो तुम नयी बाजियाँ

जीत तुम्हारे आँगन हो

मधुमय उज्जवल नया साल हो

सदा प्रफ्फुलित जन मन हो

नौ दो ग्यारह हुआ साल ये

बारह  में  पौ  बारह  हो   

मिटटी का ताज

वेदना में समाहित सृजन का संसार जैसे

सिंधु की गहराईयों में रत्न का भंडार हो

हर प्रहार से निखरता कोई निराकार हो

व्योम के गवाक्ष से झांकती है रश्मियाँ

स्वतः पूरित कुछ पलों का सत्य साकार हो

काल कवलित कल्पना, कोई मृत संवेदना

चुभ रहे कुछ शब्द हैं ,कैसे एकाकार हो !

कोई गीत तुम रचो ,समन्वय के साज पर

नाज इतना मत करो, मिटटी के ताज पर

सत्य का सौंदर्य ,सौम्यता साकार हो

द्विगदिगंत में हो व्याप्त निशब्द जयकार हो !

 

इस क्रिसमस पर

इस क्रिसमस पर प्यारे सेंटा

दे दो यही उपहार

संसद में बैठे नेता गण,

जनता का अरमान बेच रहे

बदजुबानी की बात न पूछो,

बचा खुचा ईमान बेच रहे

शर्मो हया के कुछ कपड़े इनको

दे दो थोड़ा संस्कार

नफरत के जो बीज बो रहे

दहशतगर्दी फैलाते हैं

मासूमों की खुशियों का

हरदम जो सौदा करते है

स्नेह से सूखे इनके दिल को

दे दो इशु जैसा प्यार

इस क्रिसमस पर प्यारे सेंटा

दे दो यही उपहार !

 

अभिनन्दन

जीवन  के  अम्बर  पर  

जब भी घना अंधेरा छाता है

गम की बदली छा जाती  है

मन का सूरज छिप जाता है

संकट  में  डूबे  प्राणी को 

तब  याद  तुम्हारी  आती  है

बाधाओं  के  सब  बादल को 

तत्काल उड़ा ले जाती है

संबल का सूरज उग आता

पथ आलोकित हो जाता है

उत्साह  प्राण  में  भर  देता

मन आह्लादित हो जाता है

तेरा  अभिनन्दन करने को

जग नतमस्तक हो जाता है |

संध्या की संगिनी

संध्या की संगिनी बन आगमन तुमने किया था

जुल्फ बिखरे से हुए थे ,नयन बातें कर रहे थे

तेरी उस मादक अदा ने बेचैन मुझको किया था

शहर से सब बेखबर थे ,हर जुबां खामोश थी

जब इश्क की एक ग़ज़ल का आलाप तुमने लिया था

वो मेरी दीवानगी थी ,या तेरा दर्दे बयां था

छोड़ कर महफिल उठा जब ,तुमने परदा क्यों किया था !

संध्या की संगिनी बन आगमन तुमने किया था

आस का दामन

आस का दामन मत छोड़ो

क्या हुआ जो सपने टूट गए

अरमान सजीले रूठ गए

बिखरे संबल को फिर जोड़ो ,

आस का ……

प्रतिकूल समय की धारा हो

तिनके का भी न सहारा हो

मन का दर्पण मत फोड़ो

आस का……

जब लगे की सब कुछ हुआ शेष

हर कदम पर है लग रही ठेस

पथ पर से मुँह तुम मत मोड़ो

आस का……

मेहनत हिम्मत संघर्ष लगन

जलने दो मन में एक अगन

जीवन की लय को मत तोड़ो

आस का ……

मेरा भारत महान

लोकतंत्र की लाज लुट रही

नेताओं में  खींच  तान है  

संसद संज्ञा शून्य हो रहा 

चीख रहा यह संविधान है

पर मेरा भारत महान है !

नेता जी हों या हो अफसर

कांस्टबल हो या हो कलक्टर

जन कल्याण के प्लान लुट रहे

बंदर बाँट में सब समान है

सौ में नब्बे बेईमान है

पर मेरा भारत महान है !

मंडी भरी दलालों से है

रोज मर रहा किसान है

महंगाई और भ्रष्टतंत्र से

जनता का जी परेशान है

सही गलत की बात छोड़ दो

थैली  ही सब समाधान है  

पर मेरा भारत महान है !

क्यों भुला दिया

देख  रहे  प्रभु  प्रेम  तुम्हारा

फिल्मों   में   डूबे   हैं  आप

बुला  रहे  हैं  हीरो  सब  को

लेने      उनके     ऑटोग्राफ

सुरों से बढ़ गयी है नजदीकी

सुनने लगे हैं गज़ल औ गीत

हजारिका  भूपेन   भा   गए

गज़ल  सुनाते   हैं  जगजीत

बुद्धिजीवी और  कलाकार से

स्नेह    आपने   बढ़ा    लिया

जनता की भी सुन लो प्रभुजी

नेता  को  क्यों भुला दिया ??