कदाचित

 

परिवेश की पुनरावृतिकदाचित

सन्दर्भों का संचयन

स्मित निर्निमेष अशेष

विस्मृतियों का विवेचन

जिजीविषा की विवशता

निवर्तित संबंधों का निर्वहन

अदृश्य अस्मिता का आकलन

शून्य का संभरण

तन्द्रा कोई क्षिप्त

शुष्क स्नेह सिक्त

प्रस्थान की प्रतीक्षा

मोक्ष नहीं दीक्षा

पुनः पुनः प्रयास

प्राण का आभास

संवरण निस्तरण

कदाचित यही जीवन ….

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अतिथि तुम कब जाओगे

 

सुबह सुबह खुल गयी आँखअतिथि तुम कब जाओगे

सुन कौवे की आवाज

लगे सोचने कौन से अतिथि

दर्शन देगें आज

तभी द्वार पर रुका एक रिक्शा

उतरे एक श्रीमान

कंधे पर लटकाए झोला

कहने लगे प्रणाम

हाथ जोड़ कर हमने भी

की उनकी अगवानी

कुशल -क्षेम सब पूछा

दे कर चाय नास्ता पानी

करने बैठे भोजन हम

जब कर के स्नान

उड़ गये होश हमारे श्रीमन

उनकी खुराक को जान

लगी पूछने पत्नी हमसे

कब तक इनका आसन

हफ्ते भर में देख ये लेगें

पूरे  माह का  राशन

अगले दिन ही पत्नीजी ने

डाल दिए हथियार

तुम्हीं संभालो ऐसा अतिथि

और करो सत्कार

मेरे बस का और नहीं अब

ये चूल्हा और चौका

लगी सुनाने पैर पटक कर

मिल गया उन्हें भी मौका

हाथ जोड़ कर पत्नीजी को

दी इज्जत की दुहाई

चूल्हा फूंका बेली रोटी 

सब्जी  दाल बनाई

यही सोचते रात बीत गयी

कब तक  यूँ  तड़पाओगे

चरण पड़े हम हाथ जोड़कर

अतिथि तुम कब जाओगे!

अवतार


देर बहुत कर दी प्रभु अब तो अवतार लो

प्रजातंत्र पस्त है, नेतृत्व मस्त है

राष्ट्र की दशा पर थोड़ा बिचार लो

अर्थतंत्र देश का जा रहा गड्ढे में

तेरा ही सहारा प्रभु अब तो संभार लो

युग युग अवतार लिए लोक कल्याण को

जल्दी कुछ करो प्रभु कलयुग के प्लान को

घूसखोर हाकिम है , चोर व्यापारी है

ब्लैकमनी   मंहगाई  कालाबाजारी  है

त्राहिमाम त्रहिमाम मची है चारो ओर

अब तो एक एक दिन काटना भी भारी है

घर में  लगी है आग घर के चिराग से

जल्दी कुछ करो प्रभु अब तो उबार लो

देर बहुत कर दी प्रभु अब तो अवतार लो ……….

कारोबार

 

सच्चाई बिक रही है बिक रहा ईमान है

नैतिकता के संग संग बिक रहा इंसान है  

पानी महंगा  और कौड़ी में बिकती जान है

सादगी शर्मिंदा हो रही झूठ पर गुमान है  

जिधर नज़र जा रही है सज रहा बाजार है   

सेल रिश्तों की लगी है और सस्ता प्यार है

घुन लग रहा संबंधों में कचरे में व्यवहार है

लंपटों से चल रहा अब धर्म का व्यापार है

चांदी कट रही बेशर्मों की लज्जा अब लाचार है

देख रहा ‘दिव्यांश’ व्यथित हो ,कैसा कारोबार है !!!!!

बैठक

 

संवेदन शून्यता की पराकाष्ठा है या विडम्बना

गरीबी अपनी परिभाषा सुन कर शर्मा जायेगी

क्या फर्क पड़ता है आयोग के चिंतकों को

बेशर्म चेहरों पर शिकन क्यों कर आएगी !

टी.वी चैनलों पर खूब गाल बजाते हैं

वातानुकूलित परिवेश में पसीना बहाते हैं

पांचसितारा लंच के बाद स्वीट डिश फरमाते हैं

किसी गरीब के पेट का ख्याल क्यों आयेगा !

बैठकों से गरीबी तो नहीं मिट पायेगी

मगर बेचारा गरीब जरुर मिट जायेगा !

कागजों पर पुल सड़क और बाँध बनाते हैं

कमाल के बाजीगर हैं सत्ता के ठेकेदार ,

कागजी आंकड़ों से गरीबी कम करके दिखाते हैं !

ये भूख की आग में जलते गरीब को तापते हैं

मानवीय संवेदनाओं से बहुत ऊपर उठ चुके हैं

तभी तो ये नीति निर्धारक थिंक टैंक कहलाते हैं !!!!    

गैलरी

किसकी किसकी व्यथा सुनाएँ

इस गैलरी में शामिल हैं1 तस्वीर

किसकी किसकी व्यथा सुनाएँ ! कोई बैठा काम न धंधा काम काज है किसी का मंदा कोई मन ही मन रोता है खो कर दोस्त  दुखी होता है किसी को लगा है कोर्ट का चक्कर किसी को मिलता नहीं डाक्टर … पढना जारी रखे

कुछ जाने पहचाने लोग

चेहरे बदल बदल के मिलते  कुछ जाने पहचाने लोग

टकरा  के  भी  कतरा जाते कुछ  जाने   पहचाने लोग

बेगानों  ने  गले  लगाया  साथ  निभाया हर एक पल

अपने  मतलब से मिलते हैं कुछ  जाने  पहचाने लोग  

मंजिल तक पहुंचाया जिसने हाथ मिला कर विदा हुए

गलत  पता  बतलाते हरदम कुछ जाने पहचाने लोग

सूना  आँगन  रोशन  करते  लोग  मिले  अनजाने में

घर  में आग लगाया करते कुछ जाने  पहचाने  लोग

ठोकर  खा  कर गिरते अक्सर दिया सहारा औरों  ने

खाई   रोज  खोदते  रहते  कुछ  जाने पहचाने लोग  

टूटे  मन   को  सहलाते  वो  जिनसे  न  कोई  नाता

दिल  को  रोज तोड़ते रहते कुछ जाने पहचाने  लोग …….  

 

देख लिया

मीठी बातों में लिपटे 

कड़वे मन को देख लिया,

भरे हुए आँगन में पसरे

खालीपन को देख लिया,

अपनेपन का चोला पहने

बेगानों  को  देख लिया,

प्यार भरी नज़रों में छिपते

सूनेपन को देख लिया,

खिलती हँसी के पीछे बैठे

जलते मन को देख लिया,

दोस्त बने फिरते थे उनका

नज़र फेरना देख लिया ,

तथाकथित अपने लोगों का

अपनापन है देख लिया,

रिश्तों के बंधन में हमने

गाँठ अनेकों देख लिया,

चोट लगी जब जब अंतर पर

जीवन का सच देख लिया |

काबिल

जब अहसासों  की ऊष्मा खत्म हो जाय

संवेदनाओं  पर  सफेद  चादर बिछ जाय

भावनाएँ  भाप  बन  कर उड़ जाय

रिश्तों पर  बर्फ की परत जम जाय

नजरों पर स्वार्थ  की धुंध छा जाय

स्नेह  का  अंकुरण  बंद  हो  जाय

दोस्ती की घास चाटुकार चर जाय

मन जब एकदम अकेला पड़ जाय

सत्य  का  सूरज  अस्त  हो  जाय

निःस्वार्थ  कर्म  भी  पस्त हो जाय   

तब  समझ  लेना  कि  तुम  ऊँचाइयों  के  काबिल हो  गए हो  

समाज के तथाकथित सफल और सभ्यों में शामिल हो गए हो  …..

विश्वासघात

शिष्ट आचरण औ मर्यादा

राजनीति के चोर ले गए

लोकतंत्र के थे जो प्रहरी

जनआशा की डोर ले गए

छल की बल की चाल हैं चलते  

हत्या कर दी नैतिक बल की

न्याय खड़ा असहाय बेचारा

समय को सुध नहीं अपने पल की

राम राज्य की सुखद सोच को

न जाने किस ठौर ले गए

संविधान तो वहीं पड़ा है

अनुच्छेद कहीं और ले गए

मूल्यों  का अवमूल्यन हो गया

सत्ता पर काबिज लोगों पर

आक्रोशित अब जन मन हो गया

कान खोल कर सुन लें अब वो

संयम का घट धन जल हो गया

जनतंत्र की बड़ी महत्ता

वे न समझें विफल हो गया

ओछी हरकत कर के नेता

भ्रष्टतंत्र की ओर ले गए

संसद की गरिमा कर धूमिल

देश रसातल ओर ले गए
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