व्यथा

किसे कहोगे, कौन सुनेगा ?

माना अंतर फटा जा रहान जाने क्यों

तिल तिल कर के कटा जा रहा

घुमड़ रहा है अंदर अंदर

उमड़ रहा है ज्वार समंदर

मत बिखरो तुम, कौन चुनेगा ?

किसे कहोगे, कौन सुनेगा ?

गरल हलाहल पी जाओ तुम

चोटिल अंतर सहलाओ तुम

मौन रहो चुपचाप कहो

संबंधों का संताप सहो

मत उघड़ो तुम कौन बुनेगा ?

किसे कहोगे, कौन सुनेगा ?

युगों युगों से रीत यही

अपनी लागे, औरों की नहीं

सुन व्यथा कौन सहलायेगा ?

क्या नहीं कोई इठलायेगा  ?

कथा को तेरी कौन गुनेगा ?

किसे कहोगे, कौन सुनेगा ?

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वसंत एक बीत गया

 

बचपन छूटा गया घरौंदाबीत गया

लहरों में खो भीत गया

प्रत्याशा तृष्णा आकर्षण

ले कर मन का शीत गया

बहुत कमाया बहुत लुटाया

प्रीत गई मीत गया

दांव लगाया हारा सब कुछ

छोड़ दिया तो जीत गया

सम्बंधों को  मथ कर देखा

पिघल पिघल नवनीत गया

सुर सप्तक और गीत संभाला

जीवन से संगीत गया

बूंद बूंद कर जाने कैसे

अंतर्घट कब रीत गया

पतझड़ आये सावन बरसा

फिर वसंत एक बीत गया ……

शायद इसीलिए

 

आजकल कुछ लिख नहीं पाता हूँ

ऐसा नहीं है कि सब कुछ ठहर सा गया हैशायद इसीलिए

जो कुछ बिगड़ा था सँवर सा गया है

अंतर तृप्त है या कोई प्यास है

उखड़ती नहीं अब कोई साँस है

जीवन में भर गया कोई रंग है

या कुछ नया करने की  उमंग है

नयी मुलाकात है या नया सवाल है

सुर कोई नए है या नया ताल है

झूमते पेड़ अब भाते नहीं हैं

या अब हम कोई गीत गाते नहीं हैं

हाँ ऐसा भी कुछ  नहीं है कि दोस्त बदल गये हैं

चोट खा-खा कर हम संभल गये हैं

आँखों का पानी गया है सूख

नहीं कोई तृष्णा या कोई भूख

अचानक गया है उबाल

या कोई सूखा या भूचाल

हाथ लग गया है कोई खजाना

या बैरी लगने लगा है जमाना

अच्छी लगने लगी है तन्हाई

या तान ली है हमने कोई रजाई

जमाने के साथ साथ बह नहीं पाता हूँ

बात इतनी सी है मगर कह नहीं पाता हूँ

तथाकथित सामाजिकता के हाथों मजबूर हो गया हूँ

अपने आप से ही कट कर दूर हो गया हूँ

क्योंकि अपने आप को दिख नहीं पाता हूँ

शायद इसीलिए आजकल लिख नहीं पाता हूँ ……….

 

 

कुछ कुछ गाता हूँ

 

कवि हूँ कुछ कुछ गाता हूँकवि हूँ

नयन मूंद देखूँ चित्रों को

तथाकथित अपने मित्रों को

संबंधों को और सपनों को

कभी पराये कभी अपनों को

उलझन को सुलझाता हूँ

कवि हूँ कुछ कुछ गाता हूँ

करूँ कल्पना छवि मनोहर

गहरे पैठूँ प्रेम सरोवर

बिखरे पल अनमोल धरोहर

आलिंगन उस पार उतर कर

काँटों को सहलाता हूँ

कवि हूँ कुछ कुछ गाता हूँ

अपलक दृष्टि मौन अपूरित

विगलित विचलित कुंठित खंडित

त्याज्य भी लगने लगते वन्दित

ढाई आखर के जो पंडित

नहीं समझ मैं पाता हूँ

कवि हूँ कुछ कुछ गाता हूँ ……

कई बार

 

कई बार दर्पण को देखाकई बार

कई बार कुछ गाया भी

कई बार झुठलाया सब कुछ

कई बार जतलाया भी

कई बार सब नाता छोड़ा

कई बार निभाया भी

कई बार गुब्बारा छीना

कई बार धमकाया भी

कई बार रूठा अपनों से

कई बार ठुकराया भी

कई बार की हँसी ठिठोली

कई बार बहलाया भी

कई बार जा बैठा गुमसुम

कई बार समझाया भी

कई बार उलझा प्रश्नों से

कई बार था पाया भी

कई बार था स्वांग रचा

कई बार ईठलाया भी

कई बार प्रस्फुटित हुआ

कई बार कुम्हलाया भी

कई बार सब भूल के देखा

कई बार अपनाया भी

कई बार बस डूब गया और

कई बार उतराया भी

कई बार सब पा कर खोया

कई बार सब पाया भी

कई बार जा कर के देखा

कई बार फिर आया भी

कई बार बस कई बार

बार बार फिर कई बार …

अक्सर

 

नहीं देखता स्वप्न कोई मैंself1

बस यथार्थ से  लड़ता हूँ

खुशी बाँटने की कोशिश में

चोट भी सह के झरता हूँ  

क्यों देखूँ मैं दोष और का

संभल संभल पग धरता हूँ

औरों की सुन लेता हूँ सब

पर अपनी ही करता हूँ

अपनी सुन लेता हूँ हँस कर

परनिंदा से डरता हूँ  

जीने की कोशिश में

अक्सर कई बार मैं मरता हूँ ……..

बादल

 

वक्त की कारीगरी केDSCN0870

हम सदा कायल रहे

कभी गरजे कभी बरसे

भटकते बादल रहे

नीर भर कर भी चले हम

हवाओं से हम लड़े

जब भी मौक़ा हाथ आया

नदी नाले सब भरे

कौन रोया कौन गाया

किसने दी हमको दुआ

कभी सूरज को छुपाया

कभी शिखरों को छुआ

त्रासदी का दंश भोगा

दिल से हम घायल रहे

वक्त की कारीगरी के

हम सदा कायल रहे …….

  

अवलोकन

आकलन

समय या संदर्भों ने न्याय किया या अन्याय यह तो हमारी विचारधारा की परिपक्वता और विगत के अनुभवों

के विश्लेषण पर निर्भर करता है | प्रेम के प्रसंग में किसी की सोच इस प्रस्फुटन को पूर्णकालिक मान लेती है तो

किसी और की सोच में यह  अंशकालिक ही रह जाता है | कुछ के लिये यह अहसास सार्वभौमिक और नैसर्गिक

है तो कुछ को इसमें सिवा स्वार्थ एवं  मनोविकार के सिवा  कुछ और दृष्टिगत  नहीं  होता | जीवन  यात्रा में

अनेक व्यक्तित्वों से  साक्षात्कार  होता  है | कुछ  आपके  बिखराव  को  समेट   एक  सार्थक  स्वरुप  देने  का  

प्रयास करते हैं तो कुछ आपकी अस्मिता को खंडित करने का |

जीवन  के उत्तरार्द्ध  में विगत  का  अवलोकन  करने  के  क्रम  में  यह  निर्णय  पूर्णरूपेण  उस  व्यक्तित्व पर

निर्भर करता है कि किसने  उसकी  वैयक्तिकता  को  संपूर्णता  प्रदान की ,वह  जिसने  उसे सराहा अथवा

वह जिसने उसे आहत  किया | न्याय या  अन्याय ,धर्म  या  अधर्म ,नैतिकता  वा  अनैतिकता ,पाप  अथवा  

पुण्य ,सफलता  या असफलता ,मर्यादित अथवा अमर्यादित ,ये  सभी विषय प्रासंगिक  और  सापेक्ष  हैं |

इन्हें  सार्वभौमिकता  और  सार्वकालिकता की परिधि में नहीं बाँधा जा सकता | तात्कालिक  सामाजिक  

एवं  सांस्कृतिक अवधारणाओं  के परिप्रेक्ष्य  में  अवलोकन कर के ही हम अपनी सोच को  एक  सार्थक  एवं  

रचनात्मक  ऊर्जा  से  अनुप्राणित  कर  सकते  हैं |   

अल्हड़ मस्त फकीरा मन

अल्हड़ मस्त फकीरा मन

 

अल्हड़ मस्त फकीरा मन

अपनी धुन में रमा हुआ

क्या खर्चा क्या जमा हुआ

बाँट रहा बस अपनापन

अल्हड़ मस्त फकीरा मन ….

 आनी जानी लगी हुई

ठिठकी साँसें ठगी हुई

माया ममता का बंधन

अल्हड़ मस्त फकीरा मन ….

लगी हुई एक भागमभाग

धुआँ है पसरा नहीं है आग

धन दौलत तृष्णा यौवन

अल्हड़ मस्त फकीरा मन ….

 घटता जाता है तिल तिल

अब भी ओझल है मंजिल

साज श्रृंगार  रहे बन ठन

अल्हड़ मस्त फकीरा मन ….

कई दिनों से

 

कई दिनों से सोच रहा हूँ

किस से बांचूँ अंतर अपना

किस क्षण को फिर से दोहराऊं

फिर से कौन से पन्ने पलटूं

कौन सा मुखड़ा सुर में गाऊं

भुला नहीं पाता हूँ बचपन

यौवन में संतोष कहाँ है

संबंधों की उहापोह है

छोड़ किसे ,किसको अपनाऊं

अस्ताचल की ओर बढ़ रहा

साये क्रमशः गौण हो रहे

तैयारी में कमी नहीं है

क्या बांधूँ  क्या छोड़ के जाऊं

कई दिनों से सोच रहा हूँ ……….