आवरण

 

ये सच है कि बचपन की यादें

सुहानी लगती हैं

पर पचपन की बातें भी तो

बहुत दीवानी लगती हैं

अगर उस समय  थी खोमचे पर सजी मिठाई

बर्फ के  गोले  या ईमली की खटाई

तो आज भी मिलती है रसमलाई

रबड़ी, इमरती, केसर वाली मलाईआवरण

कुल्फी की कुल्हड़, सूजी के गोलगप्पे

आलू की चाट के लप्पे झप्पे

मजा तो अब भी कोई कम नहीं

हाँ मन हो अगर बेफिक्र कोई गम नहीं

अगर बढ़ा न हो शुगर और न हो ब्लडप्रेशर

तो लीजिये मजे जी भर – भर कर

सुबह तो अभी भी लगती है बहुत सुहानी

जरा देखो सवेरे उठ कर

पर क्या खाक लगेगी अच्छी

जब होगा देर रात की पार्टी का हैंगओवर

ऐसा नहीं है कि शाम अब नहीं है आती

ये अलग बात है कि कभी काफी हॉउस में

तो कभी ट्रैफिक में ही बीत जाती

नजारे आज भी बहुत खूबसूरत हैं

जीवन का रंग और भी  बढ़ गया है

ये अलग बात है कि

हम हो गए हैं कृत्रिम

और आत्मा पर तथाकथित आधुनिकता का

आवरण चढ़ गया है ….

वसंत एक बीत गया

 

बचपन छूटा गया घरौंदाबीत गया

लहरों में खो भीत गया

प्रत्याशा तृष्णा आकर्षण

ले कर मन का शीत गया

बहुत कमाया बहुत लुटाया

प्रीत गई मीत गया

दांव लगाया हारा सब कुछ

छोड़ दिया तो जीत गया

सम्बंधों को  मथ कर देखा

पिघल पिघल नवनीत गया

सुर सप्तक और गीत संभाला

जीवन से संगीत गया

बूंद बूंद कर जाने कैसे

अंतर्घट कब रीत गया

पतझड़ आये सावन बरसा

फिर वसंत एक बीत गया ……

कई बार

 

कई बार दर्पण को देखाकई बार

कई बार कुछ गाया भी

कई बार झुठलाया सब कुछ

कई बार जतलाया भी

कई बार सब नाता छोड़ा

कई बार निभाया भी

कई बार गुब्बारा छीना

कई बार धमकाया भी

कई बार रूठा अपनों से

कई बार ठुकराया भी

कई बार की हँसी ठिठोली

कई बार बहलाया भी

कई बार जा बैठा गुमसुम

कई बार समझाया भी

कई बार उलझा प्रश्नों से

कई बार था पाया भी

कई बार था स्वांग रचा

कई बार ईठलाया भी

कई बार प्रस्फुटित हुआ

कई बार कुम्हलाया भी

कई बार सब भूल के देखा

कई बार अपनाया भी

कई बार बस डूब गया और

कई बार उतराया भी

कई बार सब पा कर खोया

कई बार सब पाया भी

कई बार जा कर के देखा

कई बार फिर आया भी

कई बार बस कई बार

बार बार फिर कई बार …

स्मृति अशेष

 

 

अन्तराल ये बहुत बड़ा था !

बिखरी स्याही फूटा दर्पणस्मृति अशेष

जगा मसान मृत्यु का नर्तन

माया ममता मोह ग्रसित मन

उड़ा पखेरू तोड़ के बंधन

स्मित रेखा क्षीण हो गयी

चिर निद्रा में लीन हो गयी

टूट तारिका तीन हो गयी

क्षण में मातृ विहीन हो गयी

कंटक में थी राह बनाती

पूर्वजन्म की वो थी थाती

शीत से लड़ती देख के बाती

शक्ति सौंप गयी जाती जाती

अनुजा थी गंभीर धीर

नयनों में देखा नहीं नीर

अंतर में धरती रही पीड़

पाने को जब थी सुधा क्षीर

देखा तो फूटा घड़ा पड़ा था

अंतराल ये बहुत बड़ा था !!!

 

अनुजा के असामयिक अवसान पर ;

 

 

गलियारा

 

baajiकभी समय के गलियारे में

ताका – झांकी कर लो तुम

भूली बिसरी उम्मीदों से

दो पल बातें कर लो तुम

पता नहीं कब साँझ ढले

कब काया माया छोड़ चले

दुनियादारी ,रिश्ते – नाते

सब बंधन को तोड़ चले

पाना खोना हँसना रोना

ये तो रीत पुरानी है

मेला यूँ ही लगा रहेगा

भीड़ तो आनी जानी है

हर क्षण उसकी कृपा बरसती

अपने हाथ पसारो तुम

बाँटों जितना भी हो पाए

जीती बाजी हारो तुम …..

 

बादल

 

वक्त की कारीगरी केDSCN0870

हम सदा कायल रहे

कभी गरजे कभी बरसे

भटकते बादल रहे

नीर भर कर भी चले हम

हवाओं से हम लड़े

जब भी मौक़ा हाथ आया

नदी नाले सब भरे

कौन रोया कौन गाया

किसने दी हमको दुआ

कभी सूरज को छुपाया

कभी शिखरों को छुआ

त्रासदी का दंश भोगा

दिल से हम घायल रहे

वक्त की कारीगरी के

हम सदा कायल रहे …….

  

जब कोई गीत

 

जब कोई गीत गुनगुनाता हूँ जब कोई गीत

किसी को आसपास पाता हूँ

थके-हारे उनींदे से पलों को

मीठी सी छुअन से गुदगुदाता हूँ

स्वरों में खोजता हूँ कुछ अनकही बातें

सुरों में बसी हुई सुगंध कोई

लय की गूंज में डूब कर के

बुझ गए दीप कुछ जलाता हूँ

कोई मुखड़ा उभर के बार बार आता है

कई पलों को छेड़ता ,सहलाता है

उसी अहसास को फिर से जी सकूं शायद

यही सोच कर अंतरा दोहराता हूँ

जब कोई गीत गुनगुनाता हूँ …..

 

कई दिनों से

 

कई दिनों से सोच रहा हूँ

किस से बांचूँ अंतर अपना

किस क्षण को फिर से दोहराऊं

फिर से कौन से पन्ने पलटूं

कौन सा मुखड़ा सुर में गाऊं

भुला नहीं पाता हूँ बचपन

यौवन में संतोष कहाँ है

संबंधों की उहापोह है

छोड़ किसे ,किसको अपनाऊं

अस्ताचल की ओर बढ़ रहा

साये क्रमशः गौण हो रहे

तैयारी में कमी नहीं है

क्या बांधूँ  क्या छोड़ के जाऊं

कई दिनों से सोच रहा हूँ ……….

अनवरत

 

अपनी हर हार पर हम मुस्कुराते रहे  

मंजिलों की ओर कदम बढ़ाते रहे  

कायर वही जो आँसू बहाये हार पर

हम तो हर विघ्न को गले लगाते रहे

स्वप्न टूटे ,आस टूटी ,आस्था बनी रही

मन में ज्योति लगन की अनवरत जली रही

हौसलों को कभी हमने न झुकने दिया

कोशिशों को किसी हाल न रुकने दिया

ग्रह नक्षत्रों में कभी अपने को न खोने दिया

कुंडली के फेर में चाहत को न रोने दिया

कल भी खुश थे ,आज का भी वक्त अपना खास है  

जीयेगें भरपूर कल को ,मन में ये विश्वास है …..