कायाकल्प

 

विमल तरंगिनी भगीरथ नंदिनी

गंगे हुई उदास

अमृत जल है बना हलाहल

कौन बुझाये प्यासकायाकल्प

करे आचमन कैसे कोई

और लगाये डुबकी

हुई जाह्नवी विकल मलिन मुख

नहीं सुने कोई सिसकी

हुई त्रिपथगा आज विपथगा

धनजल बन गया ऋणजल

मोक्षदायिनी सुरसरि गंगा

बनती जा रही दलदल  

बहुत हो गया और नहीं अब

करें सभी संकल्प

निर्मल स्वच्छ धवल गंगा हो

पुनः हो कायाकल्प …..

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अविजित संदर्भ

 

हैं अभी संदर्भ अविजित

कल्पना भी  है अधूरी,

बादलों के पार झांको

तय अभी करनी है दूरी |

व्योम के विस्तार में कुछ

प्रश्न हैं आवाज़ देते,

क्षितिज को है नापना फिर  

अभी क्यों विश्राम लेते !

क्षीर सागर ,शेष शय्या

कमल दल पर हैं विराजित,

हिमशिखर के जो हैं अधिपति

कर्म सब उनको समर्पित |

सत्य पौरुष है तुम्हारा

भागीरथ का अंश हो तुम,

विफलता जो भी मिली हो

आज कर दो सब विसर्जित |

हैं अभी संदर्भ अविजित ……….