शायद इसीलिए

 

आजकल कुछ लिख नहीं पाता हूँ

ऐसा नहीं है कि सब कुछ ठहर सा गया हैशायद इसीलिए

जो कुछ बिगड़ा था सँवर सा गया है

अंतर तृप्त है या कोई प्यास है

उखड़ती नहीं अब कोई साँस है

जीवन में भर गया कोई रंग है

या कुछ नया करने की  उमंग है

नयी मुलाकात है या नया सवाल है

सुर कोई नए है या नया ताल है

झूमते पेड़ अब भाते नहीं हैं

या अब हम कोई गीत गाते नहीं हैं

हाँ ऐसा भी कुछ  नहीं है कि दोस्त बदल गये हैं

चोट खा-खा कर हम संभल गये हैं

आँखों का पानी गया है सूख

नहीं कोई तृष्णा या कोई भूख

अचानक गया है उबाल

या कोई सूखा या भूचाल

हाथ लग गया है कोई खजाना

या बैरी लगने लगा है जमाना

अच्छी लगने लगी है तन्हाई

या तान ली है हमने कोई रजाई

जमाने के साथ साथ बह नहीं पाता हूँ

बात इतनी सी है मगर कह नहीं पाता हूँ

तथाकथित सामाजिकता के हाथों मजबूर हो गया हूँ

अपने आप से ही कट कर दूर हो गया हूँ

क्योंकि अपने आप को दिख नहीं पाता हूँ

शायद इसीलिए आजकल लिख नहीं पाता हूँ ……….

 

 

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अतिथि तुम कब जाओगे

 

सुबह सुबह खुल गयी आँखअतिथि तुम कब जाओगे

सुन कौवे की आवाज

लगे सोचने कौन से अतिथि

दर्शन देगें आज

तभी द्वार पर रुका एक रिक्शा

उतरे एक श्रीमान

कंधे पर लटकाए झोला

कहने लगे प्रणाम

हाथ जोड़ कर हमने भी

की उनकी अगवानी

कुशल -क्षेम सब पूछा

दे कर चाय नास्ता पानी

करने बैठे भोजन हम

जब कर के स्नान

उड़ गये होश हमारे श्रीमन

उनकी खुराक को जान

लगी पूछने पत्नी हमसे

कब तक इनका आसन

हफ्ते भर में देख ये लेगें

पूरे  माह का  राशन

अगले दिन ही पत्नीजी ने

डाल दिए हथियार

तुम्हीं संभालो ऐसा अतिथि

और करो सत्कार

मेरे बस का और नहीं अब

ये चूल्हा और चौका

लगी सुनाने पैर पटक कर

मिल गया उन्हें भी मौका

हाथ जोड़ कर पत्नीजी को

दी इज्जत की दुहाई

चूल्हा फूंका बेली रोटी 

सब्जी  दाल बनाई

यही सोचते रात बीत गयी

कब तक  यूँ  तड़पाओगे

चरण पड़े हम हाथ जोड़कर

अतिथि तुम कब जाओगे!

कुछ कुछ गाता हूँ

 

कवि हूँ कुछ कुछ गाता हूँकवि हूँ

नयन मूंद देखूँ चित्रों को

तथाकथित अपने मित्रों को

संबंधों को और सपनों को

कभी पराये कभी अपनों को

उलझन को सुलझाता हूँ

कवि हूँ कुछ कुछ गाता हूँ

करूँ कल्पना छवि मनोहर

गहरे पैठूँ प्रेम सरोवर

बिखरे पल अनमोल धरोहर

आलिंगन उस पार उतर कर

काँटों को सहलाता हूँ

कवि हूँ कुछ कुछ गाता हूँ

अपलक दृष्टि मौन अपूरित

विगलित विचलित कुंठित खंडित

त्याज्य भी लगने लगते वन्दित

ढाई आखर के जो पंडित

नहीं समझ मैं पाता हूँ

कवि हूँ कुछ कुछ गाता हूँ ……

सतरंगी डोर

 

थिरक उठा है मन का मोरसतरंगी डोर

सुरभित कानन ,चंचल समीर

उत्तुंग शिखर ,गंभीर धीर

हंसती प्रकृति नयनाभिराम

खग वृन्द सुनाते मधुर गान

नभ पर पसरी है धवल भोर

थिरक उठा है मन का मोर

नरम धूप है खिली खिली

अलसाई क्यारी में तितली

आवारा सी है रही घूम

फूलों का मुख है रही चूम

हर्षित पुलकित है पोर पोर

थिरक उठा है मन का मोर

बादल भी चलने लगे दांव

कहीं धूप है कहीं छाँव

झीनी झीनी बरसे फुहार

हैं रहे झूम ये देवदार

सतरंगी सी खिंच गयी डोर

थिरक उठा है मन का मोर …….

कई बार

 

कई बार दर्पण को देखाकई बार

कई बार कुछ गाया भी

कई बार झुठलाया सब कुछ

कई बार जतलाया भी

कई बार सब नाता छोड़ा

कई बार निभाया भी

कई बार गुब्बारा छीना

कई बार धमकाया भी

कई बार रूठा अपनों से

कई बार ठुकराया भी

कई बार की हँसी ठिठोली

कई बार बहलाया भी

कई बार जा बैठा गुमसुम

कई बार समझाया भी

कई बार उलझा प्रश्नों से

कई बार था पाया भी

कई बार था स्वांग रचा

कई बार ईठलाया भी

कई बार प्रस्फुटित हुआ

कई बार कुम्हलाया भी

कई बार सब भूल के देखा

कई बार अपनाया भी

कई बार बस डूब गया और

कई बार उतराया भी

कई बार सब पा कर खोया

कई बार सब पाया भी

कई बार जा कर के देखा

कई बार फिर आया भी

कई बार बस कई बार

बार बार फिर कई बार …

स्मृति अशेष

 

 

अन्तराल ये बहुत बड़ा था !

बिखरी स्याही फूटा दर्पणस्मृति अशेष

जगा मसान मृत्यु का नर्तन

माया ममता मोह ग्रसित मन

उड़ा पखेरू तोड़ के बंधन

स्मित रेखा क्षीण हो गयी

चिर निद्रा में लीन हो गयी

टूट तारिका तीन हो गयी

क्षण में मातृ विहीन हो गयी

कंटक में थी राह बनाती

पूर्वजन्म की वो थी थाती

शीत से लड़ती देख के बाती

शक्ति सौंप गयी जाती जाती

अनुजा थी गंभीर धीर

नयनों में देखा नहीं नीर

अंतर में धरती रही पीड़

पाने को जब थी सुधा क्षीर

देखा तो फूटा घड़ा पड़ा था

अंतराल ये बहुत बड़ा था !!!

 

अनुजा के असामयिक अवसान पर ;

 

 

दीपोत्सव

 

दीपवलय सज्जित हैं  दीपोत्सव

रंगोली द्वार  है

अमावास की यामिनी ने

किया सुश्रृंगार है

प्रज्ज्वलित मालिका है

उमंग अपार है

आया फिर दीपपर्व

मंगल त्योहार  है

ऋद्धि सिद्धि मिलें सदा

 विनती बारम्बार है

समृद्धि अक्षय हो 

यही उदगार है……..

समय से बात

समय से बात

कल समय से बात की थी

मिल गया था मोड़ पर वह

तंग  गलियों से निकलता

गजब की मस्ती में डूबा

चपल ,चंचल और मचलता

मैंने दी आवाज़ जो  

पल भर मुझे उसने  निहारा

मैंने पूछा क्या खबर है

आजकल भाई तुम्हारा

समय बोला ,बस न पूछो

व्यस्तता ऐसी लगी है

नींद से  पूछे  नयन  

तू सो गयी है या जगी है

बीतते दिन रात कैसे

कब महीना साल बीता

पूर्णता में डूब कर भी

मन को लगता रीता रीता

क्षण नहीं विश्राम मुझको

पता मंजिल का नहीं है

छोड़ आया था जिसे मैं

देखता हूँ ,वो यहीं है

स्वप्न वो था कल जो बीता

या जो कल मुझसे मिलेगा

बचा है कब कोई उससे

कल कोई कैसे बचेगा ?

बढ़ गया वह कब और कैसे

­­अँधेरा था ,रात न थी

कल समय से बात की थी ………….

मैत्री

 

नेह ,स्नेह से परिपूरित मैत्री

मैं से हम का संबोधन है

कुछ कहे अनकहे शब्दचित्र

मन से मन का संयोजन है

लेन देन की दुनिया में

स्व का  सर्वस्व समर्पण है

मैत्री का सम्बन्ध सदा  

अंतर आलोकित दर्पण है ………