वसंत एक बीत गया

 

बचपन छूटा गया घरौंदाबीत गया

लहरों में खो भीत गया

प्रत्याशा तृष्णा आकर्षण

ले कर मन का शीत गया

बहुत कमाया बहुत लुटाया

प्रीत गई मीत गया

दांव लगाया हारा सब कुछ

छोड़ दिया तो जीत गया

सम्बंधों को  मथ कर देखा

पिघल पिघल नवनीत गया

सुर सप्तक और गीत संभाला

जीवन से संगीत गया

बूंद बूंद कर जाने कैसे

अंतर्घट कब रीत गया

पतझड़ आये सावन बरसा

फिर वसंत एक बीत गया ……

जीवन

 

जीवन संग्राम ,समर्पण है

हर्ष ,श्रान्ति का दर्पण है2013-04-20-1595(0)(1)_Q1

आह्लाद है ये अवगुंठन है

निर्बंध है ये कभी बंधन है

ठहराव भी है चंचलता भी

संताप है ये शीतलता भी

आलाप है ये विलाप भी है

वरदान कभी अभिशाप भी है

आनंद भी है आताप है ये

प्रकृति का पुण्य प्रताप है ये

ये गीत भी है कभी कविता भी

कभी भरा हुआ कभी रीता भी

कभी उदासीन कभी आशा है

एकांत कभी ये तमाशा है

कभी लोभ मोह कभी ईच्छा है

कभी दग्ध ह्रदय की प्रतीक्षा है

अदम्य है ये दुर्गम्य है ये

अपराध कभी ,कभी क्षम्य है ये

कभी विरह ,मिलन ,आलिंगन है

अभ्यर्थन है अभिनन्दन है

पल पल होता परिवर्तन है

जीवन प्रकृति का नर्तन है

कभी तेजोमय ,प्रचंड ,प्रखर

लगता सर्वस्व कभी नश्वर

कभी फूल रहा कभी धूल रहा

अनुकूल कभी प्रतिकूल रहा

सम्मोहन है एक सपना है

अब जैसा भी है अपना है

अब जैसा भी है अपना है ……..

जीवन सपना खेल खिलौना

 

जीवन सपना खेल खिलौना

ख्वाब टूटते स्वपन बिखरते

चकाचौंध में जगते सोते

अनायास ही हँस पड़ते तो

कभी हिचकियाँ भर कर रोते

जगी हुई आँखों का सोना

जीवन सपना खेल खिलौना

कभी जीत का जश्न मनाते

कभी हार को पचा न पाते

गलत चाल पड़ जाती कोई

खेल भावना भूल हैं जाते

जीत के खोना हार के पाना

जीवन सपना खेल खिलौना

उत्सुक आतुर व्यग्र चित्त हो

अपने इच्छित को अपनाना

सजग सशंकित कौतुहल से

लालायित नज़रों से बचाना

कभी तोड़ना कभी जोड़ना

जीवन सपना खेल खिलौना

कुछ लोग

उदासीन रिश्तों को ढोते

भावशून्य  बन गए हैं लोग ,

अपनेपन की हत्या करते

पत्थर दिल बन गए हैं लोग !

कौन सुनाये ,किसको ,किसका ?

डूबे अपनी व्यथा में लोग ,

अपने मन को सुन ना पाते

उलझे ऐसी कथा में लोग |

संबंधों में सड़न हो रही ,

अपनी नाक बचाते लोग ,     

झूठी मर्यादा, इज्जत की

देते रोज दुहाई लोग !

किधर से आये ,किधर है जाना ?

भूल गए सब राहें  लोग ,

दायित्वों को भूल चुके हैं

अधिकारों को चाहें लोग !!

चेतना

संस्कृति मृतप्राय  पड़ी    है ,  रही   हमें   धिक्कार

पश्चिम  के  उन्माद  में  क्यों  भूले   बैठे  घर   बार

संस्कार सम्मान  मांगता  , झोली   को  फैला  कर

तुमने  क्या  पाया  अपना  स्वर्ण अतीत गँवा कर ?

अपनी  बोली,  अपनी  मिटटी,  अपना  सुव्यवहार

कैसे  भुला   दिया   है   तुमने   मातृभूमि का प्यार !

माता   नहीं    कुमाता   होती,  होते    पूत  कपूत

भारत माँ हो विकल खोज रही ,कहाँ है वीर सपूत

समय आ गया ,युवा शक्ति अब अपने को पहचाने

अपने  अंतर  की  शक्ति  की  महिमा को भी जाने

नहीं चाहिए स्वर्णिम जीवन  मिले  अगर   उधार

चमका कर हम दिखला सकते अपना घर संसार  

यात्रा

सर्वप्रथम उस मातृशक्ति को नमन जिन्होंने मुझे अस्तित्व प्रदान किया | मेरे अस्तित्व को सार्थक बना कर एक अस्मिता से परिचित कराने वाले पितृत्व को सादर नमन | काल और समाज के सम्मोहन में आबद्ध नित नए आयामों से अपने आप को परिचित कराता ,शैशव ,बचपन और किशोरावस्था के प्रांगण को पार करता यौवन की दहलीज पर आ खड़ा हुआ | बचपन में आत्मसात किये गए संबंधों और भावनाओं की परिभाषा एक दुविधापूर्ण परिस्थिति को जन्म देने लगी जिसने किंकर्तव्यविमूढ़ता के जटिल चक्रव्यूह की रचना का सूत्रपात कर दिया | अभिमन्यु की भांति रणक्षेत्र में उतर तो आया परन्तु आस्थाओं से आहत अंतर को सँभालने की कोशिश में हरेक बार मुंह की खानी पड़ी | विश्वास के प्रति वितृष्णा और विक्षोभ ने कभी भी किसी संबंध को प्रस्फुटित ,पल्लवित और विकसित होने का अवसर नहीं दिया | जहाँ एक ओर संबंधों में अन्तर्निहित सरोकारों को परिभाषित करने का प्रयास निष्फल रहा वहीं आत्मीयता की अभिव्यक्ति के अवसर भी एक के बाद एक कर के संवेदनशून्यता का शिकार बनते चले गए | मेरे व्यक्तित्व को निर्देशित करने के लिए किये गए प्रयासों ने एक ऐसी परिस्थिति का सृजन कर दिया जिसमें मेरी मौलिकता का दम घुटने लगा | अपरिचितों की भीड़ में तलाशता रहा किसी अपने से चेहरे को जो मेरे सरोकारों और उसमें निहित अंतर्द्वंद को परिभाषित करने में समर्थ हो | सहभागिता और सहधर्मिता की तलाश में जिस अन्वेषण की यात्रा शुरू हुई थी वो शायद आज भी अपनी मंजिल पर पहुँचने का इंतजार कर रही है |

प्राथमिकताएँ

सार्वजनिक जीवन में अनेक व्यक्तित्वों से विचार विनिमय की प्रक्रिया में
एक  संदर्भ  हमेशा मेरी चिंतन धारा को स्पंदित करता रहा | जीवन की
प्राथमिकताओं का निर्धारण करने के संग संग इनका निर्देशन एक गूढ़
विषय बना रहा है | हो सकता  है  कि  कुछ  संवेदन  शून्य व्यक्ति इसके
औचित्य पर ही प्रश्नचिन्ह लगा दें परन्तु यह संदर्भ एक सम्पूर्ण व्यक्तित्व
को  सदैव  ही  विश्लेषण करने के लिए आमंत्रित  करता रहा है | अपनी
समग्रता  में  डूबा  मनुष्य  जब  प्राथमिकताओं  की अनुक्रमणिका का
निर्धारण  करने  का  उद्यम  करने लगता है  तो उसकी विचार यात्रा में
अनेक ऐसे पड़ाव आ जाते हैं जहाँ से आगे की यात्रा उसे अत्यंत दुष्कर
प्रतीत  होने  लगती  है | कई  विरोधाभास  उसके मानस को इस कदर
जकड़ लेते  हैं  कि व्यक्ति  संघर्ष की बजाय समर्पण की परिस्थिति को
श्रेयस्कर समझने लगता है | तात्कालिक समाज और समय की धारा
के प्रवाह की दिशा में यदि अपनी प्राथमिकताओं की नाव को नियंत्रित
गति से बहने दिया जाय तो संभव है कि इस उहापोह की यंत्रणा से
कुछ हद तक मुक्ति मिल सके |

तमन्ना

बहार वक्त से पहले अगर चली जाये

फिजां को बेवजह दोष  लोग  क्यों  देते

होश  खोया अगर किसी  परवाने  ने

शमां का नाम तुम हो क्यों लेते

 चमन के रखवाले हो गए हैं अब ऐसे

गुलों का दामन  कभी भी थाम लेते

गए वो दिन ज़माने वो कब के  बीत गए

भला करने वालों का थे लोग नाम लेते  

 दिव्यांश की  सुनो तो बस इतना करो

उठाओ हाथ दुआ में इस वतन के लिए

बस इतनी तमन्ना  है दिल में मेरे मालिक

 काम आये मेरा खाक इस चमन के लिए

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अवसाद और सृजन

दुःख या अवसाद का क्षण मनुष्य का निजी और व्यक्तिगत होता है |

सुख  का  परिवेश  या  उल्लास का वातावरण तो सम्पूर्ण समष्टि के

उत्साहपूर्ण सहभागिता  का  साक्षी होता  है  परन्तु  अवसादपूरित 

वेदनायुक्त  परिस्थितिओं  में  मनुष्य  अपने  अंदर  छिपे  संबल  को

तलाशता है | उसका  अगर  कोई  सहभोक्ता होता है तो वह  उसी का

अतीत होता है | अवसाद के क्षणों को  सृजनात्मकता  के  सांचे  में

ढालना , समाज  की  निरंतरता  के  प्रति  एक  समन्वित , प्रतिबद्ध

प्रयास  होगा |  स्रष्टा   की  परिकल्पनाओं  के  प्रति  सादर  भाव  से

समर्पण  ही  अवसादग्रस्त  क्षणों  को क्रियात्मकता से परिपूर्ण  और

सजीव बना सकते हैं |

चौराहे पर

 

 

न जाने क्यों याद आ रहा

आज अतीत का प्यारा पन्ना

निश्छल चेहरों का वो हँसना

स्नेह प्रेम के रस में पगना

सदा साथ को हाथ बढ़ाना

गिरते को झट दौड़ उठाना

नोंक झोंक की प्यारी बातें

न मिलने पर देना ताना

दौड़ प्यार से गले लगाना

सखा भाव का फर्ज निभाना

ऊपर ऊपर से तो लड़ना

मगर हृदय में स्नेह का झरना

आज ये कहाँ चला गया है ?

संप्रदाय के जुलूस में

जातिवाद के जंगल में

क्षेत्रवाद के मरुस्थल में

स्नेह का झरना सूख गया है

वो चेहरे अब बदल गए हैं

छल प्रपंच से भरे हुए हैं

हँसी नहीं अब लगती निश्छल

नहीं रहे अब प्यार भरे पल

मतलब के हैं रिश्ते नाते

षड्यंत्रों की काली रातें

सूख गयी है स्नेह की धारा

डूब गया है अमन का तारा

आने वाली सुबह कौन सी

पता नहीं वह होगी कैसी

स्मृतिओं के चौराहे पर

असमंजस में घिरा खड़ा हूँ