ज्योति पर्व

 

द्वेष कलुष की कालिख पोंछोज्योतिपर्व

मंगल ध्वनि बजाओ

आँगन गलियों चौबारों संग

दिल में दीप जलाओ

मुरझाये सपनों को सींचो

कुछ अरमान जगाओ

वंचित व्यथित विकल नयनों में

आशा दीप सजाओ

अंतरतम से नेह निचोड़ो

स्नेह सुधा बरसाओ

ज्योतिर्मय हो हर पल जीवन

ज्योति का पर्व मनाओ ……

कदाचित

 

परिवेश की पुनरावृतिकदाचित

सन्दर्भों का संचयन

स्मित निर्निमेष अशेष

विस्मृतियों का विवेचन

जिजीविषा की विवशता

निवर्तित संबंधों का निर्वहन

अदृश्य अस्मिता का आकलन

शून्य का संभरण

तन्द्रा कोई क्षिप्त

शुष्क स्नेह सिक्त

प्रस्थान की प्रतीक्षा

मोक्ष नहीं दीक्षा

पुनः पुनः प्रयास

प्राण का आभास

संवरण निस्तरण

कदाचित यही जीवन ….

दीपोत्सव

 

 

सजा धजा साकेत निहारेदीपोत्सव

कब आयेगें राम ?

अट्टहास कर रहा है रावण

कौन दिलाये त्राण ?

गहन अमावस घिर आया है

आशा दीप जलाओ

बंद करो अब रुदन अमंगल

मंगल ध्वनि बजाओ

अंतस तम से बंधमुक्त हो

प्रज्ञा दीप सजाओ

श्री समृद्धि के स्वागत को

स्व सामर्थ्य जगाओ

दीपपर्व की मंगल वेला

सब सामोद मनाओ 

 

 

 

पाणिग्रहण पर लगा ग्रहण

 

दरक रही हैं दीवारें नित

दुविधा में डूबी दुहिता

गौण हो रही गुण ग्राहकता

और संबंधों की शुचितापाणिग्रहण पर लगा ग्रहण

मंडी सजी है रिश्तों की

और कन्यादानी रहे हैं तोल

देखो कैसी ये विडम्बना

मांग रही माँ दूध का मोल

कितने दिन होगा निबाह

रखेगें सब  सम्बन्ध सहेज

बनेगे  जब व्यापार विवाह

और दावानल बने  दहेज

जागो यौवन बहुत हो चुका

अब ना माँ का  दूध लजाओ

पाणिग्रहण पर लगा ग्रहण है

आहुति दे कर  मोक्ष दिलाओ …..

वसंत एक बीत गया

 

बचपन छूटा गया घरौंदाबीत गया

लहरों में खो भीत गया

प्रत्याशा तृष्णा आकर्षण

ले कर मन का शीत गया

बहुत कमाया बहुत लुटाया

प्रीत गई मीत गया

दांव लगाया हारा सब कुछ

छोड़ दिया तो जीत गया

सम्बंधों को  मथ कर देखा

पिघल पिघल नवनीत गया

सुर सप्तक और गीत संभाला

जीवन से संगीत गया

बूंद बूंद कर जाने कैसे

अंतर्घट कब रीत गया

पतझड़ आये सावन बरसा

फिर वसंत एक बीत गया ……

शायद इसीलिए

 

आजकल कुछ लिख नहीं पाता हूँ

ऐसा नहीं है कि सब कुछ ठहर सा गया हैशायद इसीलिए

जो कुछ बिगड़ा था सँवर सा गया है

अंतर तृप्त है या कोई प्यास है

उखड़ती नहीं अब कोई साँस है

जीवन में भर गया कोई रंग है

या कुछ नया करने की  उमंग है

नयी मुलाकात है या नया सवाल है

सुर कोई नए है या नया ताल है

झूमते पेड़ अब भाते नहीं हैं

या अब हम कोई गीत गाते नहीं हैं

हाँ ऐसा भी कुछ  नहीं है कि दोस्त बदल गये हैं

चोट खा-खा कर हम संभल गये हैं

आँखों का पानी गया है सूख

नहीं कोई तृष्णा या कोई भूख

अचानक गया है उबाल

या कोई सूखा या भूचाल

हाथ लग गया है कोई खजाना

या बैरी लगने लगा है जमाना

अच्छी लगने लगी है तन्हाई

या तान ली है हमने कोई रजाई

जमाने के साथ साथ बह नहीं पाता हूँ

बात इतनी सी है मगर कह नहीं पाता हूँ

तथाकथित सामाजिकता के हाथों मजबूर हो गया हूँ

अपने आप से ही कट कर दूर हो गया हूँ

क्योंकि अपने आप को दिख नहीं पाता हूँ

शायद इसीलिए आजकल लिख नहीं पाता हूँ ……….

 

 

अतिथि तुम कब जाओगे

 

सुबह सुबह खुल गयी आँखअतिथि तुम कब जाओगे

सुन कौवे की आवाज

लगे सोचने कौन से अतिथि

दर्शन देगें आज

तभी द्वार पर रुका एक रिक्शा

उतरे एक श्रीमान

कंधे पर लटकाए झोला

कहने लगे प्रणाम

हाथ जोड़ कर हमने भी

की उनकी अगवानी

कुशल -क्षेम सब पूछा

दे कर चाय नास्ता पानी

करने बैठे भोजन हम

जब कर के स्नान

उड़ गये होश हमारे श्रीमन

उनकी खुराक को जान

लगी पूछने पत्नी हमसे

कब तक इनका आसन

हफ्ते भर में देख ये लेगें

पूरे  माह का  राशन

अगले दिन ही पत्नीजी ने

डाल दिए हथियार

तुम्हीं संभालो ऐसा अतिथि

और करो सत्कार

मेरे बस का और नहीं अब

ये चूल्हा और चौका

लगी सुनाने पैर पटक कर

मिल गया उन्हें भी मौका

हाथ जोड़ कर पत्नीजी को

दी इज्जत की दुहाई

चूल्हा फूंका बेली रोटी 

सब्जी  दाल बनाई

यही सोचते रात बीत गयी

कब तक  यूँ  तड़पाओगे

चरण पड़े हम हाथ जोड़कर

अतिथि तुम कब जाओगे!

कुछ कुछ गाता हूँ

 

कवि हूँ कुछ कुछ गाता हूँकवि हूँ

नयन मूंद देखूँ चित्रों को

तथाकथित अपने मित्रों को

संबंधों को और सपनों को

कभी पराये कभी अपनों को

उलझन को सुलझाता हूँ

कवि हूँ कुछ कुछ गाता हूँ

करूँ कल्पना छवि मनोहर

गहरे पैठूँ प्रेम सरोवर

बिखरे पल अनमोल धरोहर

आलिंगन उस पार उतर कर

काँटों को सहलाता हूँ

कवि हूँ कुछ कुछ गाता हूँ

अपलक दृष्टि मौन अपूरित

विगलित विचलित कुंठित खंडित

त्याज्य भी लगने लगते वन्दित

ढाई आखर के जो पंडित

नहीं समझ मैं पाता हूँ

कवि हूँ कुछ कुछ गाता हूँ ……

सतरंगी डोर

 

थिरक उठा है मन का मोरसतरंगी डोर

सुरभित कानन ,चंचल समीर

उत्तुंग शिखर ,गंभीर धीर

हंसती प्रकृति नयनाभिराम

खग वृन्द सुनाते मधुर गान

नभ पर पसरी है धवल भोर

थिरक उठा है मन का मोर

नरम धूप है खिली खिली

अलसाई क्यारी में तितली

आवारा सी है रही घूम

फूलों का मुख है रही चूम

हर्षित पुलकित है पोर पोर

थिरक उठा है मन का मोर

बादल भी चलने लगे दांव

कहीं धूप है कहीं छाँव

झीनी झीनी बरसे फुहार

हैं रहे झूम ये देवदार

सतरंगी सी खिंच गयी डोर

थिरक उठा है मन का मोर …….