कदाचित

 

परिवेश की पुनरावृतिकदाचित

सन्दर्भों का संचयन

स्मित निर्निमेष अशेष

विस्मृतियों का विवेचन

जिजीविषा की विवशता

निवर्तित संबंधों का निर्वहन

अदृश्य अस्मिता का आकलन

शून्य का संभरण

तन्द्रा कोई क्षिप्त

शुष्क स्नेह सिक्त

प्रस्थान की प्रतीक्षा

मोक्ष नहीं दीक्षा

पुनः पुनः प्रयास

प्राण का आभास

संवरण निस्तरण

कदाचित यही जीवन ….

वसंत एक बीत गया

 

बचपन छूटा गया घरौंदाबीत गया

लहरों में खो भीत गया

प्रत्याशा तृष्णा आकर्षण

ले कर मन का शीत गया

बहुत कमाया बहुत लुटाया

प्रीत गई मीत गया

दांव लगाया हारा सब कुछ

छोड़ दिया तो जीत गया

सम्बंधों को  मथ कर देखा

पिघल पिघल नवनीत गया

सुर सप्तक और गीत संभाला

जीवन से संगीत गया

बूंद बूंद कर जाने कैसे

अंतर्घट कब रीत गया

पतझड़ आये सावन बरसा

फिर वसंत एक बीत गया ……

समय से बात

समय से बात

कल समय से बात की थी

मिल गया था मोड़ पर वह

तंग  गलियों से निकलता

गजब की मस्ती में डूबा

चपल ,चंचल और मचलता

मैंने दी आवाज़ जो  

पल भर मुझे उसने  निहारा

मैंने पूछा क्या खबर है

आजकल भाई तुम्हारा

समय बोला ,बस न पूछो

व्यस्तता ऐसी लगी है

नींद से  पूछे  नयन  

तू सो गयी है या जगी है

बीतते दिन रात कैसे

कब महीना साल बीता

पूर्णता में डूब कर भी

मन को लगता रीता रीता

क्षण नहीं विश्राम मुझको

पता मंजिल का नहीं है

छोड़ आया था जिसे मैं

देखता हूँ ,वो यहीं है

स्वप्न वो था कल जो बीता

या जो कल मुझसे मिलेगा

बचा है कब कोई उससे

कल कोई कैसे बचेगा ?

बढ़ गया वह कब और कैसे

­­अँधेरा था ,रात न थी

कल समय से बात की थी ………….

गलियारा

 

baajiकभी समय के गलियारे में

ताका – झांकी कर लो तुम

भूली बिसरी उम्मीदों से

दो पल बातें कर लो तुम

पता नहीं कब साँझ ढले

कब काया माया छोड़ चले

दुनियादारी ,रिश्ते – नाते

सब बंधन को तोड़ चले

पाना खोना हँसना रोना

ये तो रीत पुरानी है

मेला यूँ ही लगा रहेगा

भीड़ तो आनी जानी है

हर क्षण उसकी कृपा बरसती

अपने हाथ पसारो तुम

बाँटों जितना भी हो पाए

जीती बाजी हारो तुम …..

 

मनुज तुम महान हो

 

अजेय विज्ञ प्रग्य हो

समर्थ हो समग्र होप्रणेता

उदात्त दत्त चित्त हो

सुकर्म में प्रवृत्त हो

आस्था अगम्य हो

प्रेरणा अदम्य हो

अस्मिता अमूल्य हो

समष्टि स्वर्गतुल्य हो

स्वयं सिद्ध प्राण हो

उर्ध्वमुखी ज्ञान हो

मोह तृण समान हो

दिव्यता का भान हो

मनुज तुम महान हो

मनुज तुम महान हो …………….

चलो चलें उस ठौर

 

चलो चलें उस ठौर जहाँ पर न हो कोई कोलाहलचिंतन

शांत सतह के नीचे न पलती हो कोई भी हलचल

नयनाभिराम सौन्दर्य लाभ को न हो दृष्टि लालायित

क्षुधा तुष्टि का ध्येय लिये दिशाहीन भटके विचलित

अंतरतम की अकुलाहट को सुने ,गुने कुछ ध्यान धरे

हीरे मोती माणिक पत्थर किस छाजन पर गौर करे

पल पंक्षी यूँ उड़ा जा रहा ,होता जाता है ओझल

कर ले पूरी बात समय से चपल चित्त मत हो चंचल

चलो चलें उस ठौर जहाँ पर न हो कोई कोलाहल……

अवलोकन

आकलन

समय या संदर्भों ने न्याय किया या अन्याय यह तो हमारी विचारधारा की परिपक्वता और विगत के अनुभवों

के विश्लेषण पर निर्भर करता है | प्रेम के प्रसंग में किसी की सोच इस प्रस्फुटन को पूर्णकालिक मान लेती है तो

किसी और की सोच में यह  अंशकालिक ही रह जाता है | कुछ के लिये यह अहसास सार्वभौमिक और नैसर्गिक

है तो कुछ को इसमें सिवा स्वार्थ एवं  मनोविकार के सिवा  कुछ और दृष्टिगत  नहीं  होता | जीवन  यात्रा में

अनेक व्यक्तित्वों से  साक्षात्कार  होता  है | कुछ  आपके  बिखराव  को  समेट   एक  सार्थक  स्वरुप  देने  का  

प्रयास करते हैं तो कुछ आपकी अस्मिता को खंडित करने का |

जीवन  के उत्तरार्द्ध  में विगत  का  अवलोकन  करने  के  क्रम  में  यह  निर्णय  पूर्णरूपेण  उस  व्यक्तित्व पर

निर्भर करता है कि किसने  उसकी  वैयक्तिकता  को  संपूर्णता  प्रदान की ,वह  जिसने  उसे सराहा अथवा

वह जिसने उसे आहत  किया | न्याय या  अन्याय ,धर्म  या  अधर्म ,नैतिकता  वा  अनैतिकता ,पाप  अथवा  

पुण्य ,सफलता  या असफलता ,मर्यादित अथवा अमर्यादित ,ये  सभी विषय प्रासंगिक  और  सापेक्ष  हैं |

इन्हें  सार्वभौमिकता  और  सार्वकालिकता की परिधि में नहीं बाँधा जा सकता | तात्कालिक  सामाजिक  

एवं  सांस्कृतिक अवधारणाओं  के परिप्रेक्ष्य  में  अवलोकन कर के ही हम अपनी सोच को  एक  सार्थक  एवं  

रचनात्मक  ऊर्जा  से  अनुप्राणित  कर  सकते  हैं |   

अल्हड़ मस्त फकीरा मन

अल्हड़ मस्त फकीरा मन

 

अल्हड़ मस्त फकीरा मन

अपनी धुन में रमा हुआ

क्या खर्चा क्या जमा हुआ

बाँट रहा बस अपनापन

अल्हड़ मस्त फकीरा मन ….

 आनी जानी लगी हुई

ठिठकी साँसें ठगी हुई

माया ममता का बंधन

अल्हड़ मस्त फकीरा मन ….

लगी हुई एक भागमभाग

धुआँ है पसरा नहीं है आग

धन दौलत तृष्णा यौवन

अल्हड़ मस्त फकीरा मन ….

 घटता जाता है तिल तिल

अब भी ओझल है मंजिल

साज श्रृंगार  रहे बन ठन

अल्हड़ मस्त फकीरा मन ….

जमूरा

 

आस्था है ,अस्मिता है

अदम्य वो अहसास है

मनुज की हर गम्यता में

व्याप्त वो विश्वास है

वो खड़ा नेपथ्य में

तब पल ये पूरा है 

कर रहा करतब वही

नर तो जमूरा है ……

चाहत

 

आसमान को छूने की चाहत

जमीन से दूर कर देती है

स्वर्ग की चाहत धर्मराज को भी

अकेला चलने के लिये

मजबूर कर देती है

ज्यों ज्यों ऊँचाइयों पर जाओगे

ठंढी सफेद बर्फ ही पाओगे

संवेदना शून्य और सर्द अहसासों के बीच

किसी मरीचिका में खो जाओगे

दुनिया को भले ही कर लोगे अपनी मुट्ठी में

पर वो मचलती खिलखिलाती किलकारियां

नहीं ढूँढ पाओगे

आम के कोलाहल से दूर

किसी खास एकांत की तलाश

अपनी अस्मिता से दूर कर देती है

हर कदम पर बढ़ते जाते हैं फासले

अकेला चलने के लिये

मजबूर कर देती है …….