कुछ कुछ गाता हूँ

 

कवि हूँ कुछ कुछ गाता हूँकवि हूँ

नयन मूंद देखूँ चित्रों को

तथाकथित अपने मित्रों को

संबंधों को और सपनों को

कभी पराये कभी अपनों को

उलझन को सुलझाता हूँ

कवि हूँ कुछ कुछ गाता हूँ

करूँ कल्पना छवि मनोहर

गहरे पैठूँ प्रेम सरोवर

बिखरे पल अनमोल धरोहर

आलिंगन उस पार उतर कर

काँटों को सहलाता हूँ

कवि हूँ कुछ कुछ गाता हूँ

अपलक दृष्टि मौन अपूरित

विगलित विचलित कुंठित खंडित

त्याज्य भी लगने लगते वन्दित

ढाई आखर के जो पंडित

नहीं समझ मैं पाता हूँ

कवि हूँ कुछ कुछ गाता हूँ ……

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छवि

शाश्वत सत्य

शाश्वत सत्य

मैत्री

 

नेह ,स्नेह से परिपूरित मैत्री

मैं से हम का संबोधन है

कुछ कहे अनकहे शब्दचित्र

मन से मन का संयोजन है

लेन देन की दुनिया में

स्व का  सर्वस्व समर्पण है

मैत्री का सम्बन्ध सदा  

अंतर आलोकित दर्पण है ………

जब कोई गीत

 

जब कोई गीत गुनगुनाता हूँ जब कोई गीत

किसी को आसपास पाता हूँ

थके-हारे उनींदे से पलों को

मीठी सी छुअन से गुदगुदाता हूँ

स्वरों में खोजता हूँ कुछ अनकही बातें

सुरों में बसी हुई सुगंध कोई

लय की गूंज में डूब कर के

बुझ गए दीप कुछ जलाता हूँ

कोई मुखड़ा उभर के बार बार आता है

कई पलों को छेड़ता ,सहलाता है

उसी अहसास को फिर से जी सकूं शायद

यही सोच कर अंतरा दोहराता हूँ

जब कोई गीत गुनगुनाता हूँ …..

 

विरह व्यथा

 

पूर्णिमा की प्रभा बिखरी  

सितारे कर रहे झिलमिल

शरद की स्निग्ध संध्या

चंद्रमा हँस रहा खिलखिल

टकटकी कैसी लगी है

खोजती है दृष्टि किसको

नृत्य करती रश्मियाँ ये

रिझाती न जाने किसको ?

चुभ रही है चाँदनी ये

बिन पिया भाए न रजनी

विरह बादल कब छ्टेगें

सोच में डूबी है सजनी

आ भी जाओ कंत मेरे

दग्ध मेरा तन बदन है

बरस बीते अब तो बरसो

असहनीय अब अगन है ………

कब से आस लगाये हैं

 

स्नेहांगन में स्वप्न सरीखे

कुछ पल बिखरे पाए थे

पता नहीं उसर जमीन पर

कोंपल कब उग आये थे

विस्मृत चाहत दस्तक देती 

शांत खड़ी प्रत्याशा में

आमंत्रण देता सम्मोहन

नयनों की जिज्ञासा में

शांत सतह पर कैसी हलचल

किसने बंशी लगाई है

मन मछली को क्या समझाएं

सत्य है या परछाई है

उहापोह है असमंजस है 

फिर से बादल छाये हैं

अबके अंतर भीगे शायद

कब से आस लगाये हैं ………..

विरहन

 

आये ना श्याम गिरिधारी

बाट तकत हैं सब सखियन संग

श्री वृषभानु दुलारी

काहे निष्ठुर बने कन्हैया

व्याकुल राधा प्यारी

श्याम दरस को तरसे नैना

कृपा करो हे मुरारी

कहें राधिका सखी विशाखा

अबके दूंगीं गारी

कान्हा संग चित ऐसो लाग्यो

सुध बिसरे ब्रज नारी     

आये ना श्याम गिरिधारी