कायाकल्प

 

विमल तरंगिनी भगीरथ नंदिनी

गंगे हुई उदास

अमृत जल है बना हलाहल

कौन बुझाये प्यासकायाकल्प

करे आचमन कैसे कोई

और लगाये डुबकी

हुई जाह्नवी विकल मलिन मुख

नहीं सुने कोई सिसकी

हुई त्रिपथगा आज विपथगा

धनजल बन गया ऋणजल

मोक्षदायिनी सुरसरि गंगा

बनती जा रही दलदल  

बहुत हो गया और नहीं अब

करें सभी संकल्प

निर्मल स्वच्छ धवल गंगा हो

पुनः हो कायाकल्प …..