पाणिग्रहण पर लगा ग्रहण

 

दरक रही हैं दीवारें नित

दुविधा में डूबी दुहिता

गौण हो रही गुण ग्राहकता

और संबंधों की शुचितापाणिग्रहण पर लगा ग्रहण

मंडी सजी है रिश्तों की

और कन्यादानी रहे हैं तोल

देखो कैसी ये विडम्बना

मांग रही माँ दूध का मोल

कितने दिन होगा निबाह

रखेगें सब  सम्बन्ध सहेज

बनेगे  जब व्यापार विवाह

और दावानल बने  दहेज

जागो यौवन बहुत हो चुका

अब ना माँ का  दूध लजाओ

पाणिग्रहण पर लगा ग्रहण है

आहुति दे कर  मोक्ष दिलाओ …..