फिजां

 

वफा की चाह कैसी दिल में लिये फिरते हो

अब तो चाँद भी फिजां को छोड़ देता है

कहाँ की दोस्ती है कौन निभाने वाला

बुझा के प्यास वो घड़ा फोड़ देता है

कसूर किसका कहें कौन गुनहगार यहाँ

शाम को साया भी छोड़ देता है

इशारे पर उसके ये सांस चलती है

एक लम्हे में हर रुख को मोड देता है

कैसे जज्बात किसकी आरजू में हो मरते

प्यार के बुत को ये जमाना तोड़ देता है ………

आवारगी

 

जब अंधेरों से दोस्ती कर ली

उजाले हमें मुँह चिढ़ाने लगे

गैरों से कोई शिकवा नहीं है

अब अपने आजमाने लगे

दिया जमाने ने बदले में जो कुछ

बेबाकी पर अपने पछताने लगे

पल दो पल में पाया था वो सब

जिसे भूलने में जमाने लगे

टूटे घरौंदे और सूनी निगाहें

सपनों को उनमें बसाने लगे

खुशियों ने जब छोड़ा दामन हमारा

गाने पुराने हम गाने लगे

तनहाइयाँ फिरती हैं आवारगी में  

अफसाने भी सुनने सुनाने लगे ………..

क्यों

 

लोग मौसम की तरह रंग बदलते क्यों हैं

जो गिरने से डरते हैं वो चलते क्यों हैं !

ख्वाबों की मंजिल अगर हकीकत में है

तो सपने हमारी आँखों में पलते क्यों हैं !

इश्क में  मिट जाना अगर इबादत  है

लोग  होश खो कर  सँभलते  क्यों  है !

ये सच है कि  कफन में जेब नहीं होती

दौलत जुटाने को लोग मचलते क्यों हैं !

‘दिव्यांश’  देता  हमें  वो ऊपरवाला है

पता  नहीं  वो  हमसे  जलते क्यों हैं !    

लम्हे

 

अपना गम ख़ामोश था और दर्द भी था थम गया

फिर भी जाने क्यों जमाने की नज़र हम पर रही

दिल  की  बातों  को हमेशा राज़ ही रहने  दिया

फिर  हवाओं  को  आज  बेचैनी ये कैसी हो रही

मेरी  चाहतों  को  अब  भी किसी का इंतज़ार है

क्या हुआ जो हर कदम पर ठोकर हमें लगती रही  

एक  अरसे  बाद  लम्हे  फिर से कुछ कहने लगे

क्या पता  इतने दिनों तक चुप सी क्यों लगी रही

राज़  अपने दिल में रखिये किसी पर मत खोलिए

क्या कहें  ‘दिव्यांश’  दिल में पीड़ क्या उठती रही  …..

कोई बात बने

 

बना  लेना  दोस्त चाहे सारे जमाने को अपना

निबाह कर सको जो  दोस्ती तो कोई बात बने

अफसाने मोहब्बत के सुन लो सुना लो कितना

रखो ख्याल जो जज्बात का तो कोई बात बने

चमन में अबके मौसम बहार का झूम कर आया

गुलों पे छा जाय जो रंगत  तो कोई बात बने

भर  लो झोली में अपने लाल जवाहर कितने

जरूरतमंद को निभा  सको तो कोई बात बने

वो हमसे कहते हैं कोई तुमसा नहीं अपना ‘दिव्यांश ‘

साथ जो दो कदम चल सकें तो कोई बात बने

तो कोई बात बने

 

मिलाओ हाथ कितनी भी गर्मजोशी से ,

मिला सको जो दिल से दिल तो कोई बात बने |

झुकाओ सर मंदिर में चाहे मस्जिद में ,

मिटा दो अगर मैं को तो कोई बात बने |

हँसी लबों पे चिपकाने से भला क्या होगा ,

गर खुद पे हँस सको तो कोई बात बने |

पहुँच जाओ चाहे कितनी भी ऊँचाई पर ,

उठा सको जो मुफलिसों को तो कोई बात बने |

बड़े लोग बन जाने से क्या होगा ‘दिव्यांश’

जो काम आ सको किसी के तो कोई बात बने ………..  

सरमाया

करिश्मा ऐ कुदरत है या गुलों की मज़बूरी

चमन पर सुरूर सा कोई छाया है

हौंसला जमाने  को जो  दिखा पाता है

शान में  उसके  सब ने  सर झुकाया है 

बहारों रौनके चमन पर  यूँ न इतराओ

वक्त की मार से कब कोई बच पाया है

गुलों की रानाइयाँ एक दिन फना हो जायेगीं

शाम ढलते ही छुप जाता अपना साया है  

ये  हकीकत भी बहुत ज़ालिम है ‘दिव्यांश’

छीन ले जाता है जो यादों का सरमाया है……..

रस्म जमाने का

हवाएं  कुछ  नमीं  सी ले के आई हैं

कोई कतरा ख़ामोशी से गिरा होगा

पीले चाँद में दिखता है जिसे हुस्न बेदाग़

इश्क  का  मारा  कोई  रहा  होगा

लोग आये  हैं  हमें  समझाने वो जिनका

अपना कोई हिसाब पुराना होगा

बेदिली लाख कर लो दिल से अपने चाहे

रस्म जमाने का तो निभाना होगा

न गिला है किसी से न शिकवा ‘दिव्यांश’

बढ़ाये हाथ कोई तो मिलाना होगा ……..  

वो अहसास

ग़मों के साये हैं ,भूख है ,बेचारगी है

सवालात इश्क के वो उठाते चले गए

कौन पूछेगा हाल ए दिल किसी शख्स आम का

चंद खास लोगों से वो  निभाते चले गए 

यूँ तो गम और भी हैं इस बेदर्द जमाने में

वो  सच्चाइयों से दामन बचाते चले गए 

जिधर भी देखता हूँ उन्हें ही पाता हूँ

जो ख्वाबों को गले से लगाते  चले गए

अहसास छलकते हैं, पैमाने से उनके

अफसोच वो मुफलिसों को भुलाते चले गये

हरेक चेहरे पर छा जाए खुदा का नूरदिव्यांश

शान में उसके सुबहो शाम सर झुकाते चले गए