ब्रज की गली गली में

 

ब्रज की गली गली में

गूंजे है नाम तेरा

अपना बना लो मुझको

तू ही तो प्राण मेरा

अब तो तेरे शरण बिन

मेरी गति नहीं है

सुध हर लिया है तुमने

अब न मेरी मति है

सुन लो सलोने बांके

मेरा नहीं है अब कुछ

हे राधे  श्याम सुन्दर

सौंपा है तुझको सब कुछ

भटकूँ इधर उधर मैं

खोजूं ठिकाना तेरा

अब प्रभु मुझे उबारो

बिन तेरे कौन मेरा

ब्रज की गली गली में

गूंजे है नाम तेरा

 

उन वीरों को नमन करें

 

मातृभूमि की आन बान पर जिसने जान लुटाया है

उन वीरों को नमन करें आज़ाद जिन्होंने कराया है

व्यथा गुलामी की क्या कहना ,अंतर पर तम छाया था

हर एक धड़कन बंधी हुई थी ,जन मन पर गम छाया था

झूल गए जो देश की खातिर जिसने प्राण गँवाया है

उन वीरों को नमन करें आज़ाद जिन्होंने कराया है

मिली हमें आज़ादी जो ये ,मोल हम इसका पहचाने

शान तिरंगे की रखें हम ,राष्ट्र के गौरव को जानें

गोली खा अपने सीने पर ध्वज जिसने फहराया है

उन वीरों को नमन करें आज़ाद जिन्होंने कराया है !

 

  

आस

 

कभी चुपके से वो मेरे सवालों को जगाता है

जगी आँखों में वो मेरे ख्यालों को सजाता है

कभी जब चोट खा कर के तमन्ना लड़खड़ाती है

मेरे कानों में वो कोई विजय का गीत गाता है

कभी जब मंजिलें नज़रों से होने दूर लगतीं हैं

वो मेरा हमकदम बन कर नयी राहें दिखाता है

समय को जीतने की आस जब  मजबूर लगती है

मेरे टूटे हुए संबल को वो फिर से बढ़ाता है

मेरी हर सोच जब उलझे समय की चोट सहती है

मेरी आशाओं की बाती को वो फिर से जलाता है

मेरे कानों में वो कोई विजय का गीत गाता है ——

होरी खेलत हैं मुरारी

होरी खेलत हैं मुरारी बिरज में

होरी खेलत हैं मुरारी

रंग ,अबीर ,गुलाल मलत हैं

राधा को गिरिधारी

धूम मचत है आज बिरज में

झूमें सब नर नारी   

बिरज में होरी खेलत हैं मुरारी

मोहन लय के रंग अबीरा

राधा कनक पिचकारी  

रास रचावत हैं गोपियन संग

श्याम सुन्दर बनवारी  

बिरज में होरी खेलत हैं मुरारी

कर धर कें राधा रानी को

डारत रंग कन्हैया

हर्षित ब्रज कें नर नारी सब

नाचत ता ता थैय्या

सुर नर मुनि सब मगन होय रहे

निरख युगल छवि प्यारी

बिरज में होरी खेलत हैं मुरारी

कर्मठता

देखा करते स्वप्न हमेशा

मन ही मन खुश होते हैं

नहीं हिलाते हाथ पैर जो

जीवन भर वो रोते हैं

क्या करना है मेहनत कर के

देने वाला दाता है

समय से पहले भाग्य से ज्यादा

कौन भला ले पाता है

मन को यूँ ही समझा कर के

पौरुष का पल खोते हैं

देखा करते स्वप्न हमेशा

मन ही मन खुश होते हैं

देने वाला देता उसको

जो आवाज़ लगाता है

मेहनत कर के सोच को अपनी

राह नई दिखलाता है

समय से हर पल लोहा लेते

कर्मठ विजयी होते हैं

देखा करते स्वप्न हमेशा

मन ही मन खुश होते हैं

जो विघ्नों को गले लगाते

हार से जो न डरते हैं

लक्ष्य को अपने हासिल करने

हर क्षण उद्यम करते हैं

ऐसे भी हैं लोग जहाँ में

चाँद पे गेंहूँ बोते हैं  

देखा करते स्वप्न हमेशा

मन ही मन खुश होते हैं

नहीं हिलाते हाथ पैर जो

जीवन भर वो रोते हैं………..

गैलरी

गोपी विरह

इस गैलरी में शामिल हैं1 तस्वीर

हे वंशीधर श्याम सांवरे नयनन आन बसो ! विरह अगन में दग्ध हुआ मन मेरी सुध भी ले लो मोहन दर्शन जल की प्यासी अँखियाँ पल लागे बरसों ,नयनन आन बसो चित ले गयो है बांकी चितवन बरसत नैना है … पढना जारी रखे

गणतंत्र III

भ्रष्ट हुआ प्रजातंत्र भारती विकल है ,

राजनीति अब घनघोर दल दल है |

ग्राह से त्रस्त हुई रो रही है जनता ,

मोक्ष की प्रतीक्षा में अब हर पल है |

समाधान लुप्त हुआ आश भी निराश है ,

गंगाजल से भी नहीं बुझ रही प्यास है |

खोजते फिर रहे भारती की लाज हम ,

गुम हो गया जो कहीं यहीं आसपास है |

नौजवानों उठो अब देश ये पुकारे ,

आओ मिल हम गणतंत्र को संवारें !

गणतंत्र II

आज़ादी के छंद आज हुए स्वच्छंद सब

भारती व्यथित है सिसक रही ममता

नेताओं की छवि पर प्रश्नचिन्ह लग रहा

सत्ता की दासी बन गयी है स्वतन्त्रता

गणतंत्र गलियों में गुम हो गया कहीं

आज़ादी बेसुरी हुई ,असहाय जनता

संविधान संज्ञा शून्य हुआ फिरता है

नेतृत्व दिशाहीन खो गयी है समता

आओ मिल चलें हम नए रस्ते की ओर

कर रही है इंतज़ार नयी सी व्यवस्था !

गणतंत्र

कोटि कोटि प्राणों ने किया उत्सर्ग जब

आज़ादी के सूरज ने किया उजियारा था,

कोटि कोटि कंठों ने गाया जयगान तब

भारती के शान में लगाया जयकारा था |

नयी थी दिशा और नया सा सवेरा था

न था कोई डर अब न कोई अँधेरा था,

आज़ादी की हवा में उमंगों की पतंग पर

बुलंद भारत की  भविष्य का बसेरा था |

तूफानों से  निकली  हुई  किश्ती  को

बड़ी मुश्किल से मिला ये किनारा  था,

जनम लिया  था एक  नए भारत  ने

संविधान ला कर के गणतंत्र को संवारा था |

कोटि कोटि प्राणों ……………….