व्यथा

किसे कहोगे, कौन सुनेगा ?

माना अंतर फटा जा रहान जाने क्यों

तिल तिल कर के कटा जा रहा

घुमड़ रहा है अंदर अंदर

उमड़ रहा है ज्वार समंदर

मत बिखरो तुम, कौन चुनेगा ?

किसे कहोगे, कौन सुनेगा ?

गरल हलाहल पी जाओ तुम

चोटिल अंतर सहलाओ तुम

मौन रहो चुपचाप कहो

संबंधों का संताप सहो

मत उघड़ो तुम कौन बुनेगा ?

किसे कहोगे, कौन सुनेगा ?

युगों युगों से रीत यही

अपनी लागे, औरों की नहीं

सुन व्यथा कौन सहलायेगा ?

क्या नहीं कोई इठलायेगा  ?

कथा को तेरी कौन गुनेगा ?

किसे कहोगे, कौन सुनेगा ?

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