अंतरजातीय विवाह के फायदे और नुकसान

विवाह

भारतीय समाजशास्त्रियों के मतानुसार विवाह नामक संस्था के उद्भव और विकास का श्रेय मुनि उद्दालक के पुत्र, श्वेतकेतु को जाता है | ऋषि श्वेतकेतु ने तत्कालीन समाज में व्याप्त अव्यवस्था और कदाचार को दूर कर एक मर्यादित और उत्तरदायित्व की भावना से प्रेरित संस्था की नींव डाली | कालांतर में विवाह एक महत्वपूर्ण सामाजिक संस्था के रूप में स्थापित हुआ तथा  सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिदृश्य पर  विविध आयामों में अपनी अनिवार्यता का अहसास कराता रहा |

बदलते कालखंड के संग संग विवाह के सामाजिक और सांस्कृतिक स्वरुप में भी कई बदलाव आते चले  गए| जहाँ एक ओर कुछ परिमार्जित संस्कारों ने विवाह के स्वरुप को एक दिव्य संस्कार के रूप में प्रतिस्थापित कर दिया तो वहीं दूसरी ओर दहेज,जाति एवं वर्ण व्यवस्था जैसी कुरीतियों ने इसकी आत्मा को निष्प्राण कर दिया | कट्टरपंथियों ने विवाह की  सामाजिक अनिवार्यता को गौण कर इसे एक जटिल धार्मिक अनुष्ठान के रूप में परिवर्तित कर दिया | समय समय पर अनेक समाज सुधारकों ने इस संस्था के मूल स्वरुप को जीवंत बनाये रखने के प्रयास किये और सामाजिक सरोकारों से जोड़ने में सफल भी रहे |

वर्तमान काल में भी परिवार या विवाह जैसी  सामाजिक संस्थाओं में  अनेक सामाजिक और सांस्कृतिक  परिवर्तन हुए हैं | रूढ़िवादी मानसिकताओं के प्रति विद्रोह के स्वर मुखर होते जा रहे हैं | विवाह भी इससे अछूता नहीं रहा है और इसके स्वरुप में भी अनेक बदलाव दृष्टिगोचर हो रहे हैं | अंतरजातीय विवाह का प्रसंग पहले भी यदा कदा  उठता रहा है  परन्तु विगत दो तीन दशकों से  इसका चलन सामाजिक स्तर पर अधिकाधिक स्वीकार्य होता जा रहा है | अनेक जातियों और उपजातियों के जटिल चक्रव्यूह में उलझ कर भारतीय समाज अक्सर अपने सामाजिक और सांस्कृतिक दायित्वों के निर्वहन में असहाय सा अनुभव करने लगता है | अंतरजातीय विवाह इन जटिल परिस्थितिओं से अलग  एक नये सामाजिक और सांस्कृतिक परिवेश का सृजन करने में अहम भूमिका निभा रहा है |

किसी भी विचारधारा के समर्थन और विरोध में स्वर उठना स्वाभाविक है परन्तु उस विचारधारा की जीवंतता और निरंतरता उसकी सामाजिक स्वीकार्यता पर निर्भर करती   है | अंतरजातीय विवाह ने आधुनिक भारतीय समाज को एक नया स्वरुप प्रदान किया है जो स्वागतेय है | दो अलग अलग परिवेश से निकल कर आये व्यक्तित्व जब विवाह के पवित्र बंधन में आबद्ध हो कर एक नयी सामाजिक इकाई के रूप में विकसित होने लगते हैं ,तो कई स्तरों पर  जुड़ाव की प्रक्रिया सामाजिक समन्वय के नए प्रतिमान स्थापित करने लगती है | क्षेत्रीय और प्रांतीय संस्कृतियों का एक दूसरे को समझने और आत्मसात करने की प्रक्रिया एक नवीन सांस्कृतिक परिवेश का सृजन करने लगती है |

यदि इतिहास के पन्नों में अंतरजातीय विवाह के विषय में अन्वेषण किया जाय तो कई रोचक और प्रेरणादायक प्रसंग उपस्थित हो जाते हैं | पौराणिक कथाओं में ब्रम्हा और गायत्री का विवाह प्रसंग हो या महाराज शांतनु और सत्यवती का परिणय प्रसंग ,हूणों और मुगलों के काल में किये गए सामरिक विवाह संबंध हों  या विभिन्न प्रांतीय क्षत्रपों द्वारा स्थापित किये गए विवाह संबंध ,सभी दृष्टान्त अंततः सामाजिक और सांस्कृतिक उन्नयन का संवाहक  बने | वर्तमान  समाज की जीवंतता और गत्यात्मकता में भी अंतरजातीय विवाह संबंधों ने महत्वपूर्ण रचनात्मक भूमिका निभाई है | खान पान ,वस्त्र विन्यास , क्षेत्रीय और प्रांतीय प्रभावयुक्त भाषा शैली और लोक साहित्य , स्थानीय रहन सहन ,लोक परम्परा एवं हस्त कला,लोक नृत्य एवं लोक गीत इत्यादि का समन्वय और सम्मिश्रण ,समाज को नवीनता  का अनुभव कराता है और नवीन सांस्कृतिक आयामों को जन्म देता है | अंतरजातीय प्रकृति के विवाह संबंध  दो पृथक समुदायों के बीच सेतु की भूमिका निभाते   हैं | समाज और लोक संस्कृति को समन्वित और परिमार्जित करने  के साथ साथ नए आयामों को आत्मसात करने के अवसर उपलब्ध कराते हैं | सौहाद्र और बंधुत्व की भावना बलवती होती है तथा  स्थानीय एवं क्षेत्रीय परिवेश  से  निकल  कर  एक विस्तृत फलक पर  “वसुधैव कुटुम्बकम”  का  सूत्र  प्रतिध्वनित  होने लगता  है |

अंतरजातीय विवाह संबंधों के, जहां  एक ओर सकारात्मक और धनात्मक परिणाम परिलक्षित हुए हैं  वहीं कुछ नकारात्मक प्रतिफल भी दृष्टिगत हुए हैं | अनेक अवसरों पर इस तरह के संबंधों को सामाजिक विरोध और बहिष्कार का सामना भी करना पड़ा है | समुदायों के मध्य वैमनश्यता और असहिष्णुता की स्थिति का निर्माण होने लगता है | तनावयुक्त परिवेश में मानवीय संवेदनाओं और कोमल भावनाओं पर कुठाराघात ,पाशविकता को सर उठाने का अनुकूल अवसर  उपलब्ध करा देती है | समाज के उपेक्षापूर्ण व्यवहार से प्रताड़ित युगल नकारात्मकता का शिकार हो जाते हैं और कभी कभी तो आत्म हनन को उद्यत हो जाते हैं | सामाजिक स्वीकार्यता का आभाव वैवाहिक दायित्वों के निर्वहन में बाधा बन जाती है और फलस्वरूप एक नवसृजित विवाह संबंध अवसान की ओर अग्रसर  होने लगता है |

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में संचार माध्यमों यथा दूरदर्शन एवं एफ. एम रेडियो ,सिनेमा ,पत्र पत्रिकाओं तथा अन्य सामाजिक और सांस्कृतिक संगठनों ने अंतरजातीय विवाह संबंधों के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रसित मानसिकता को आत्म विवेचन के लिए बाध्य किया है | आधुनिक समाज इन संबंधों के प्रति उदार दृष्टिकोण अपना रहा है जो भविष्य की चुनौतिओं को देखते हुए स्वागतेय है | अंतरजातीय विवाह संबंधों का संरक्षण और संवर्धन , मानव समाज को संगठित ,जीवंत और कालजयी स्वरुप प्रदान करेगा ,इसमें कोई शंका नहीं होनी चाहिए |   

  

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