समय से बात

समय से बात

कल समय से बात की थी

मिल गया था मोड़ पर वह

तंग  गलियों से निकलता

गजब की मस्ती में डूबा

चपल ,चंचल और मचलता

मैंने दी आवाज़ जो  

पल भर मुझे उसने  निहारा

मैंने पूछा क्या खबर है

आजकल भाई तुम्हारा

समय बोला ,बस न पूछो

व्यस्तता ऐसी लगी है

नींद से  पूछे  नयन  

तू सो गयी है या जगी है

बीतते दिन रात कैसे

कब महीना साल बीता

पूर्णता में डूब कर भी

मन को लगता रीता रीता

क्षण नहीं विश्राम मुझको

पता मंजिल का नहीं है

छोड़ आया था जिसे मैं

देखता हूँ ,वो यहीं है

स्वप्न वो था कल जो बीता

या जो कल मुझसे मिलेगा

बचा है कब कोई उससे

कल कोई कैसे बचेगा ?

बढ़ गया वह कब और कैसे

­­अँधेरा था ,रात न थी

कल समय से बात की थी ………….

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