मूरत

 

मूरत एक अनूठी   

यह कहलाती है

चंचल चपल प्रवाह  मूरत

बाँटती जाती है  

कुल से छूटा साथ

कूल का पता नहीं

खुले व्योम के द्वार

पखेरू उड़ा नहीं

करतल से झरती है

अविरत स्नेह सुधा

पुष्टि तुष्टि करती

स्व की गौण क्षुधा

मंगल ममता प्रेम

निस्वार्थ समर्पण है  

सुत हित में

निज देह नेह का अर्पण है

नहीं उऋण हो सकता

कोई ज्ञानी है

मातृ समर्पित शीश

श्रेष्ठतम प्राणी है !!!!!

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