जब कोई गीत

 

जब कोई गीत गुनगुनाता हूँ जब कोई गीत

किसी को आसपास पाता हूँ

थके-हारे उनींदे से पलों को

मीठी सी छुअन से गुदगुदाता हूँ

स्वरों में खोजता हूँ कुछ अनकही बातें

सुरों में बसी हुई सुगंध कोई

लय की गूंज में डूब कर के

बुझ गए दीप कुछ जलाता हूँ

कोई मुखड़ा उभर के बार बार आता है

कई पलों को छेड़ता ,सहलाता है

उसी अहसास को फिर से जी सकूं शायद

यही सोच कर अंतरा दोहराता हूँ

जब कोई गीत गुनगुनाता हूँ …..

 

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