चाहत

 

आसमान को छूने की चाहत

जमीन से दूर कर देती है

स्वर्ग की चाहत धर्मराज को भी

अकेला चलने के लिये

मजबूर कर देती है

ज्यों ज्यों ऊँचाइयों पर जाओगे

ठंढी सफेद बर्फ ही पाओगे

संवेदना शून्य और सर्द अहसासों के बीच

किसी मरीचिका में खो जाओगे

दुनिया को भले ही कर लोगे अपनी मुट्ठी में

पर वो मचलती खिलखिलाती किलकारियां

नहीं ढूँढ पाओगे

आम के कोलाहल से दूर

किसी खास एकांत की तलाश

अपनी अस्मिता से दूर कर देती है

हर कदम पर बढ़ते जाते हैं फासले

अकेला चलने के लिये

मजबूर कर देती है …….

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4 टिप्पणियाँ “चाहत” पर

  1. आम के कोलाहल से दूर

    किसी खास एकांत की तलाश

    अपनी अस्मिता से दूर कर देती है

    हर कदम पर बढ़ते जाते हैं फासले

    अकेला चलने के लिये

    मजबूर कर देती है …….

    ati sundar… khas ekant ki talash apni asmita se door kar deti hai… ek sach bahut khoobsurati se bayan hua hai…

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