जिंदगी

 

जब मन में लगी हो कोई आस

हर पल अटकी रहती है साँस

लटकती रहती है ऐसी फाँस

कि जी हो जाता है उचाट, चित्त उदास

हर क्षण बढ़ती जाती है एक प्यास    

कब और कैसे होगी ये पूरी

इसी चाहत में किसी तरह जिये जाते हैं     

सूने दिन और रातें अधूरी

चाहे रात हो कितनी भी लंबी

पौ तो फटती ही है

चाहे जैसे भी हो

जिंदगी तो कटती ही है …….

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2 टिप्पणियाँ “जिंदगी” पर

  1. चाहे रात हो कितनी भी लंबी

    पौ तो फटती ही है

    चाहे जैसे भी हो

    जिंदगी तो कटती ही है …….

    ye to ekdam sahi kaha apne… har rat ki subah to hoti hi hai… aur chahe jo ho, jaisi ho….jindagi rukti nahin kat hi jati hai….

  2. बहुत सराहनीय रचना | ज़िंदगी कभी बेज़ार है तो कभी गुलज़ार है ,कभी ग़मों का ढेर है तो कभी खुशियों की बौछार है |
    जब मन में लगी हो आस —– शाश्वत पंक्ति है | शायद यही जीने का बहाना है |ऐसी रचना के लिए शुक्रिया |

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