क्यों

 

लोग मौसम की तरह रंग बदलते क्यों हैं

जो गिरने से डरते हैं वो चलते क्यों हैं !

ख्वाबों की मंजिल अगर हकीकत में है

तो सपने हमारी आँखों में पलते क्यों हैं !

इश्क में  मिट जाना अगर इबादत  है

लोग  होश खो कर  सँभलते  क्यों  है !

ये सच है कि  कफन में जेब नहीं होती

दौलत जुटाने को लोग मचलते क्यों हैं !

‘दिव्यांश’  देता  हमें  वो ऊपरवाला है

पता  नहीं  वो  हमसे  जलते क्यों हैं !    

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