हिंदी ,चुनौतियाँ और सरोकार

 

महाकवि विद्यापति ने कभी कहा था कि “देसिल बयना सबजन मिठ्ठा” परन्तु माँ भारती के माथे की बिंदी “हिंदी” की

मिठास  को  आज  अनुभूति  के  नए परिदृश्य में परिभाषित करना अपेक्षित प्रतीत हो रहा है | आधुनिकता की चाशनी

में  पगी  हुई  हिंदी  की  स्वीकार्यता  का  आकलन  करना  प्रासंगिक  तो  होगा  ही  संग  संग  अपेक्षित भी |

विगत दो दशकों में हिंदी ने वैश्विक समाज को भाव सम्प्रेषण के लिए एक वैविध्यता

और  संभावनाओं   से  परिपूर्ण  माध्यम  उपलब्ध  कराया  है | हिंदी  के  वैश्वीकरण

के  फलस्वरूप  जो सामाजिक , आर्थिक , तकनीकी , साहित्यिक , सांस्कृतिक  एवं

राजनैतिक चुनौतियाँ उभर कर आई  हैं इनका विश्लेषण राष्ट्रभाषा को नए आयामों

से अलंकृत करेगा | विश्व  हिंदी  सम्मेलनों के माध्यम से पूर्व में जिन सरोकारों को

संबोधित करने का प्रयास किया गया है ,उनकी  सार्थकता  और उपादेयता पर वर्तमान परिदृश्य के आलोक में चिंतन

एक महत्वपूर्ण प्रसंग है | देव भाषा संस्कृत की गंगोत्री  से  निकल  कर  हिंदी   का  प्रवाह  विभिन्न  प्रांत , सांस्कृतिक

परिवेश , सामाजिक  एवं  धार्मिक  मान्यताओं  को  अपनी  संप्रेषणीयता  के  सूत्र  में  बांधता गतिमान रहा है | आज

कश्मीर  से  कन्याकुमारी तथा गुजरात से  मिजोरम तक हिंदी ने अपनी महत्ता  को  स्थापित  कर  लिया  है | विगत

पाँच- छः  वर्षों  में विश्व  अंतरजाल  पर  हिंदी   भाषा   एवं  साहित्य  ने  सम्मानजनक  उपस्थिति   दर्ज   कराई  है |

दिनानुदिन अंतरजाल पर हिंदी  साइटों  की संख्या में वृद्धि हो रही है परंतु गुणवत्ता की दृष्टि से इनका आकलन एक

महत्वपूर्ण  विषय  है | गूगल  जैसी  सूचना  तकनीक के क्षेत्र  की  कंपनियों के प्रयास से देवनागरी लिपि में टाइपिंग

अत्यंत सुगम हो गया  है | माइक्रोसॉफ्ट और लिनुक्स  आदि  ऑपरेटिंग  सिस्टम्स ने हिंदी की महत्ता को स्वीकार

करते हुए अपने तकनीकी  उत्पादों  का  हिंदी संस्करण भी उपलब्ध कराया है | आज हिंदी को किसी उत्पाद की भांति

एक सक्षम विपणन रणनीति  के  अंतर्गत प्रचारित और प्रसारित करने की आवश्यकता है | आज का युवा वर्ग जहाँ

एक ओर छपी हुई पत्र पत्रिकाओं  और  पुस्तकों  के  प्रति  उदासीन होता जा रहा है वहीं दूसरी तरफ कंप्यूटर ,टेबलेट

और मोबाइल के माध्यम से अंतरजाल पर अधिक से अधिक सक्रिय होता जा रहा है | हिंदी ब्लोगिंग या चिट्ठाजगत

की लोकप्रियता तेजी से बढ़ती जा रही है और इसके माध्यम  से  कई  नवोदित  रचनाकार  हिंदी  साहित्य एवं भाषा

को जनसाधारण की अपेक्षाओं से जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं  | हिंदी की साहित्यिक धरोहर  को डिजिटाइज्ड स्वरुप

में विश्व अंतरजाल पर उपलब्ध कराने का प्रयास निश्चित रूप से प्रशंसनीय है |टेलीविजन पर प्रसारित होने वाले

धारावाहिक  हों  या  हिंदी  सिनेमा  जगत , इन  क्षेत्रों  में बढ़ता निवेश हिंदी के लिए शुभ संकेत है | तेजी से बदलते

सामाजिक और सांस्कृतिक परिवेश  से  हिंदी  भाषा और साहित्य भी अछूता नहीं रहा है | रचनाकार तथा पाठक ,

विषय वस्तु एवं विन्यास ,प्रस्तुतीकरण एवं शिल्प शैली ,इन सभी बिंदुओं की प्रासंगिकता पर चर्चा की आवश्यकता

है | हिंदी  की  एक अर्थव्यवस्था तेजी से अपने पाँव पसार रही है ,समय की मांग है कि इस अर्थव्यवस्था की संरचना

को बेहतर ढंग से परिभाषित करते हुए ,आधुनिक सामाजिक एवं सांस्कृतिक सरोकारों के संग समन्वित करने का

प्रयास किया जाय |महान रचनाकार भारतेंदु हरिश्चंद्रजी का ये कथन  कि  “निज भाषा उन्नति  अहै, सब  उन्नति

को  मूल” आज  भी  हम  सबके  लिए  प्रेरणास्रोत  है | आज   इस   मूल  मंत्र  को  प्रत्येक  हिंदी  प्रेमी  अपने  हृदय

में  स्थान  दे  कर  राष्ट्रभाषा  के  सर्वांगीण विकास  में  महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है |                                            

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