तस्वीर रिश्तों की

 

दीवार पर टंगी हुई यादें

निहारती नज़रें

शीशे पर समय की धूल

कुछ बदरंग से हो गये हैं

भावनाओं के चटख रंग

रिश्तों की फ्रेम से

अहसासों की कील की पकड़

ढीली पड़ने लगी है

उन लम्हों को सहारा देतीं

विश्वास की ‘माउन्टिंग’

सीलने लगी है   

मन को मथता यह प्रश्न

क्या समय के साथ

संबंध भी बदल जाते हैं ???

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5 टिप्पणियाँ “तस्वीर रिश्तों की” पर

  1. दिव्यांश जी….

    क्षमा चाहती हूँ, व्यस्तताओं के चलते पिछले कुछ दिनों से आपके ब्लॉग पर नहीं आ सकी… आपकी रचनाओं को पढ़ना रचनात्मक हृदय की खुराक जैसा है… हमेशा कुछ नए ढंग से बात कहने का अंदाज आपकी रचनाओं को भीड़ से अलग खड़ा करता है….

    आपने रिश्तों की इस तस्वीर को इतनी खूबसूरती से रचा है… कि मेरे पास इसकी प्रशंसा करने लायक शब्द नहीं है… बस एक ही शब्द है जो उपयुक्त लगता है “अद्भुत” …

    सादर
    मंजु

    • आदरणीय मंजु जी
      नमस्कार
      आपकी व्यस्तताओं का आभास मुझे रमा जी के ब्लाग पर की गयीं प्रविष्टियों के माध्यम से हो गया था | हिंदी साहित्य और विशेष रूप से काव्य धारा के प्रति आपका समर्पण निश्चित रूप से सराहनीय और अनुकरणीय है | आप पूर्ण सामर्थ्य से इस यज्ञ में अपनी सहभागिता बनाये रखें ,और आने वाली पीढ़ी के लिये प्रेरणा बन कर अपने रचनाकर्म को नई ऊँचाइयों पर ले जाने में सक्षम हों ,इसी मंगल कामना के संग …
      सादर

    • यशवंत जी
      नमस्कार
      आप समय समय पर अपनी भावनाओं से अवगत कराते रहते हैं ,इसके लिये आपका ह्रदय से आभार
      आपकी विवेचनात्मक टिप्पणियों का सदैव स्वागत है
      धन्यवाद

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