मत ठुकराओ

 

बना जनक हैवान ,सुता को सतत सताए ,

छाती हुई विदीर्ण ,दुहिता को कौन बचाए !

किधर  जा  रहे लोग अंधेरा क्यों है छाया ,

पूछ रही मासूम  मुझे क्यों  है  ठुकराया !

विवश जननी घुट रही सोच आगे का डरती ,

देख दुर्दशा बेटी  की  न जीती  है  न  मरती !

बहुत  हो  चुका संबंधों को अब न लजाओ ,

दुर्गा ,लक्ष्मी ,सरस्वती को मत ठुकराओ !

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5 टिप्पणियाँ “मत ठुकराओ” पर

  1. विवश जननी घुट रही सोच आगे का डरती ,

    देख दुर्दशा बेटी  की  न जीती  है  न  मरती !

    बहुत  हो  चुका संबंधों को अब न लजाओ ,

    दुर्गा ,लक्ष्मी ,सरस्वती को मत ठुकराओ !

    Kash ! Log samajh jayen …..very poweful statement. Divyansh ji apki rachnayen bahut ojasvi hoti hain. Sundar sandesh deti huyi rachna ke liye badhayi.

    • नमस्कार , एक रचनाकार के नैतिक ,सामाजिक और सांस्कृतिक दायित्वों को महसूस कर सकूँ और उनका निर्वहन करने का ईमानदार प्रयास कर सकूँ तो आत्मसंतोष का अनुभव कर सकूंगा | इस प्रयास में आपकी सहभागिता के लिये ह्रदय से आभारी हूँ |
      सादर

  2. बना जनक हैवान ,सुता को सतत सताए ,

    छाती हुई विदीर्ण ,दुहिता को कौन बचाए…iske madhyam se sachhaai ko ujagar kiya he….jante sabhi he phir bhi aankhe band karke sab dekh rahe he..

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