प्रणेता

 

छाया है कैसा अंधियारा

क्यों निश्चेतन विश्व विजेता है !

कहाँ गया युग परिवर्तक ,

क्यों मौन नव धर्म प्रणेता है !

जीवन रण है मानव योद्धा

समय चुनौती देता है ,

करके रचना व्यूह नए नित

कठिन परीक्षा लेता है |

छोड़ो प्रमाद कर सिंहनाद

हर जड़ता का संहार करो ,

कर प्राप्त विजय सन्दर्भों पर

नव ऊर्जा का संचार करो !!

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