सम्यक

 

क्यों भटक रहे हो इधर उधर !

कुछ वक्त चुरा लो हलचल से

दो पल डूबो  अपने अंदर ,

पाना चाहो यदि मनवांछित

पहले देखो तुम कुछ खो कर !

पद मान प्रतिष्ठा धन वैभव

पाने हर नर ललचाता है ,

पर अर्जित कर के हर इच्छित

क्या सुख शांति पा जाता है !

पाकर के दो पल का विलास

कुछ और उलझता मोह पाश ,

यदि नहीं चाहते तितर बितर

सुख पाओ सम्यक अपनाकर !

क्यों भटक रहे हो इधर उधर !!

 

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