ग्रहण

 

नित्य और निरंतर चलायमान कालचक्र ,सृष्टि  के स्वरुप को प्रत्येक क्षण प्रभावित

करता नई चुनौतिओं  को आमंत्रित करता रहता है | एक प्रश्न सदैव ही मानव मन

को  मथता  रहा  है  कि  क्या  सुख  या  दुःख , प्रसन्नता  या  अवसाद , उन्नति या

अवनति , सफलता   या   विफलता , यश  या  अपयश , हानि  या  लाभ  , निरंतर

परिवर्तनशील  और  चलायमान  कालचक्र का परिणाम हैं या प्रारब्ध का प्रतिफल |

पूरी  सृष्टि  को  अपनी ऊर्जा से अनुप्राणित करने वाले  भास्कर भी ग्रहण से ग्रसित

होने  पर  त्याज्य  हो जाते हैं | कैसी  विडंबना है कि सूर्य के तेज से प्रकाशित चंद्रमा ही ग्रहण  का  कारण  बन जाते हैं और

ग्रहण  की  अवधि  में  दिवाकर  की अक्षय ऊर्जा पर पलने  वाले  जीव  उधर देखना तो दूर  उनकी छाया तक से बचते नज़र

आते हैं | इस प्रसंग  पर  विचार  करने  के  उपरांत  विपरीत परिस्थितिओं  में  घिरे  मनुष्य से कन्नी काटते लोगों को देख

कुछ  भी आश्चर्यजनक प्रतीत नहीं होता | संध्या के आगमन के साथ ही अपनी परछाई भी साथ छोड़ जाती है तथा नितांत

अकेले  होने  का  अहसास अंतर्मन पर दस्तक देने लगता है | अवसाद्पूरित और विपरीत परिस्थितिओं  में एकाकीपन ही

एकमात्र  सहचर रह जाता है | ग्रहण से मोक्ष  और सृष्टि   का   पुनः   पूर्ववत   हो  जाना  मानव  मात्र  के  लिए  ये सन्देश

है कि कितना  भी  प्रतिकूल  परिवेश  क्यों  न  हो , धैर्य  के  साथ  अपने अस्तित्व की रक्षा करते  हुए  मनुष्य  पुनः  अपने 

सामर्थ्य  को  प्रतिस्थापित  कर  सकता  है |

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2 टिप्पणियाँ “ग्रहण” पर

  1. कैसी विडंबना है कि सूर्य के तेज से प्रकाशित चंद्रमा ही

    ग्रहण का कारण बन जाते हैं और ग्रहण की अवधि में दिवाकर की अक्षय ऊर्जा पर

    पलने वाले जीव उधर देखना तो दूर उनकी छाया तक से बचते नज़र आते हैं | इस

    प्रसंग पर विचार करने के उपरांत विपरीत परिस्थितिओं में घिरे मनुष्य से कन्नी

    काटते लोगों को देख कुछ भी आश्चर्यजनक प्रतीत नहीं होता …

    एकदम सच …. जब बुरा वक़्त हो तो क्या अपने क्या पराये सब कन्नी ही काटते नज़र आते हैं…विपरीत परिस्थितियों में धैर्य ही सबसे बड़ा साथी है..
    सादर

  2. aap jaroor dhyan ki dahraiyo ko paya he…ye vichar koi sadharan vichar nahi he…..bahut rahasya bhara he apne vicharo me…me bahut prabhavit hu apki is rachna se……sach he jin surya bhagwan ko ham prasannta ke nai urja ka source kahte he….unhe hm grahan kal me dekhte tak nahi…..to bure samayam me hamara koi sath nahi de to isme KISI KO kyo desh dena…

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