अविजित संदर्भ

 

हैं अभी संदर्भ अविजित

कल्पना भी  है अधूरी,

बादलों के पार झांको

तय अभी करनी है दूरी |

व्योम के विस्तार में कुछ

प्रश्न हैं आवाज़ देते,

क्षितिज को है नापना फिर  

अभी क्यों विश्राम लेते !

क्षीर सागर ,शेष शय्या

कमल दल पर हैं विराजित,

हिमशिखर के जो हैं अधिपति

कर्म सब उनको समर्पित |

सत्य पौरुष है तुम्हारा

भागीरथ का अंश हो तुम,

विफलता जो भी मिली हो

आज कर दो सब विसर्जित |

हैं अभी संदर्भ अविजित ……….

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3 टिप्पणियाँ “अविजित संदर्भ” पर

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