कुछ लोग

उदासीन रिश्तों को ढोते

भावशून्य  बन गए हैं लोग ,

अपनेपन की हत्या करते

पत्थर दिल बन गए हैं लोग !

कौन सुनाये ,किसको ,किसका ?

डूबे अपनी व्यथा में लोग ,

अपने मन को सुन ना पाते

उलझे ऐसी कथा में लोग |

संबंधों में सड़न हो रही ,

अपनी नाक बचाते लोग ,     

झूठी मर्यादा, इज्जत की

देते रोज दुहाई लोग !

किधर से आये ,किधर है जाना ?

भूल गए सब राहें  लोग ,

दायित्वों को भूल चुके हैं

अधिकारों को चाहें लोग !!

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