सोचता हूँ क्या लिखूं मैं

सोचता हूँ क्या लिखूं मैं !

अर्थ अब अनर्थ हो गया

व्यवस्था है लुप्त प्राय ,

नैतिकता सो गयी है

कौन अब इसको जगाए !

राजनीति बिना नीति

व्यवसाय बन गया है ,

बहुजन हिताय कहाँ !

निज हिताय बन गया है  

विचारों की कौन कहे !

संस्कार क्या बला है ?

काटता जो  सबका गला

आदमी अब वो भला है !

नीयत है सोच रही

किस भाव पर बिकूँ  मैं ?

सोचता हूँ क्या लिखूं मैं  !!

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