अभिशप्त पलाश

देहरादून की घाटियों में घूमता सहस्त्रधारा की  ओर  चला जा रहा था | फागुन मास का बौराया मौसम और होली का मदमस्त माहौल मन प्राण को अपने सम्मोहन में आबद्ध कर चुका था | घुमावदार पहाड़ी सड़कों पर फिसलती नज़रें अचानक प्रकृति के अदभुत  सौदर्य में उलझ  सी गयीं और मेरे पैर कार की ब्रेक पर दबते चले गए | ऊँचे पत्रहीन पलाश के पेड़ एक कतार में पूरा सज धज कर  यात्रियों का स्वागत कर रहे थे | लाल  और हलकी नारंगी आभा बिखरते टेसू के फूल अत्यंत मनोहारी लग रहे थे | कैमरे में इस अनुपम छटा को कैद करता मन बार बार सोच रहा था कि प्रकृति ने पलाश के साथ न्याय किया है या कि अन्याय |

फूल तो दिया पर निर्गंध जैसे किसी रूपवती रमणी को मातृत्व की सुगंध से वंचित कर दिया हो | ऊँचाइयों पर अस्तित्व तो दिया पर पुष्पसुधा विहीन कर भंवरों के सानिध्य का अवसर छीन लिया | बड़े बड़े ,गोल गोल चिकने पत्ते भी दिये ,वो भी तीन तीन एक साथ ,पर देव पर अर्पण होने का सौभाग्य छीन लिया | कहाँ विल्वपत्र और कहाँ ढाक के तीन  पात ! वसंत के आगमन की सूचना देता पलाश जेठ की तपती दुपहरी में भी बदरंग नहीं होता | तपती हवाओं के थपेडों को सहता निष्प्राण वातावरण को अपने दहकते सौन्दर्य से जीवंत बना देता है | टेसू के फूल की जीवंतता भले ही माला में न गुंथे ,देव के स्पर्श से अछूता रह जाय,किसी रूपमती के गजरे की शोभा न बन सके पर सूखने के पश्चात ये बहुत कुछ दे जाते हैं | फागुन की मस्ती में डूबा सौन्दर्य बिना टेसू के रंग के निष्प्राण लगता है | ढाक के पत्तों से बने पत्तल पर परोसा व्यंजन और भी स्वादिष्ट लगने लगता है | टेसू के फूल हों,कलियाँ हों या पेड़ की छाल, इनके औषधीय उपयोग से अनेक व्याधियों का निदान संभव हो जाता है | पलाश के पेड़ का हर हिस्सा मानव समाज को अपनी उपयोगिता से अनुगृहित कर जाता है | पता नहीं किस भूल ने पलाश को एक अभिशप्त जीवन जीने के लिये विवश कर दिया | क्या पलाश इस अभिशाप से कभी मुक्त हो पायेगा ???   

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2 टिप्पणियाँ “अभिशप्त पलाश” पर

  1. फूल तो दिया पर निर्गंध जैसे किसी रूपवती रमणी को मातृत्व की सुगंध से वंचित कर दिया हो | ऊँचाइयों पर अस्तित्व तो दिया पर पुष्पसुधा विहीन कर भंवरों के सानिध्य का अवसर छीन लिया | बड़े बड़े ,गोल गोल चिकने पत्ते भी दिये ,वो भी तीन तीन एक साथ ,पर देव पर अर्पण होने का सौभाग्य छीन लिया | कहाँ विल्वपत्र और कहाँ ढाक के तीन पात !
    sir really good
    it is not easy to understand the depth of above lines.
    remarkable ji

  2. जैसे किसी रूपवती रमणी को मातृत्व की सुगंध से वंचित कर दिया हो ऊँचाइयों पर अस्तित्व तो दिया पर पुष्पसुधा विहीन कर भंवरों के सानिध्य का अवसर छीन लिया | बड़े बड़े ,गोल गोल चिकने पत्ते भी दिये ,वो भी तीन तीन एक साथ ,पर देव पर अर्पण होने का सौभाग्य छीन लिया | कहाँ विल्वपत्र और कहाँ ढाक के तीन पात ! -अत्यंत ही बेहतरीन चित्रण |

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