ख्वाब सुहाना बचपन का

दोपहर का खाना खा  कर धूप सेंकने बरामदे में रखी आराम कुर्सी पर पसर गया |

सर्दियों  की  गुनगुनी  धूप  और   एफ.एम  पर   बजता   एक   सुरीला  सा  गाना,

आया  है  मुझे  फिर याद वो ज़ालिम , गुज़रा  जमाना बचपन का ” और  मैं  खो

गया   अपने  प्यारे  बचपन  के  दिनों में | उन  दिनों   हमारा  स्कूल  घर  से  कोई

छह-सात किलोमीटर की दूरी पर  हुआ  करता था | गर्मियों में सुबह साढ़े पांच के

आस  पास  हमारे   दोस्त  सड़क  पर से आवाज़ लगाया करते और मैं स्कूल बैग 

उठाये  दौड़  पड़ता था | हरेक  सुबह  कुछ  नया रोमांच ले कर आती थी | उछलते

कूदते हमारी टोली चल पड़ती थी स्कूल  की  ओर | गवर्नर  हाउस  के  पास  पहुँच  

कर  सिपाहियों की कदम ताल देखते और उन्हें सलामी देते | सिपाहियों  को  भी 

शायद  हमारी   सेना  का  ही  इंतज़ार  रहता  था |  हमें  देख वो भी उत्साह से भर  

जाते  और  उनकी  चुस्ती   और   भी  बढ़ जाती | थोड़ा  आगे  बढ़ते  ही  सड़क के

दोनों ओर  बड़ी बड़ी  सरकारी   कोठियां   शुरू  हो  जातीं | कोठियों  के चारों  तरफ  

तरह   तरह   के  फलदार   वृक्ष   भी   लगे  हुए  थे |  हमारी मंडली इस सड़क पर

खासी   उत्साहित   हो   जाती |  सबकी  निगाहें  इस  अन्वेषण में लग जातीं कि

कौन   सी   कोठी  जनशून्य  दिख  रही  है | सही   मौका  देख  एक  एक कर सब  

हाते  के  अंदर दाखिल हो जाते  और  फिर  कोई  हरी  जलेबी  तो  कोई  बेर  और

रसभरी  पर  टूट  पड़ते | आम  के  पेड़ों  पर  टिकोले  आ  गए  होते  थे |  हमारी

कोशिश रहती थी कि  टिकोलों  को  नुकसान  न पहुंचे, नहीं  तो  आम  का  मज़ा 

जाता   रहेगा |  अमरुद   के   पेड़   हमारे  प्रकोप  से  त्रस्त  रहते  थे |  कोई  पके

पपीतों  पर  निगाहें   लगाता  तो  किसी  की  नज़र  चिनिया  केले  के हत्थों पर

टिक जाती | इस  फलाहार के  बाद  विद्यालय  की  सुध  आती  और  सब  एक

दूसरे को चलने के लिये आवाज़ लगाने लगते |  प्रातः  काल  की मंद सुवासित

हवा का  आनंद  लेते   और   कल  किस   कोठी  में  फलाहार  करना  है , इसकी

योजना  बनाते  कब  हम  स्कूल  की  गेट  पर  पहुँच  जाते , पता भी न चलता |

उस   प्राकृतिक  परिवेश   में  हँसता  खेलता   बचपन  कब  बीत  गया ,इसका

पता भी न चला |

कानों में गूंज रही थीं गीत की पंक्तियाँ ;

वो खेल वो साथी  वो झूले ,वो दौड़ के कहना आ छू ले

हम आज तलक भी न भूले,वो ख्वाब सुहाना बचपन का …………….

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6 टिप्पणियाँ “ख्वाब सुहाना बचपन का” पर

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