सर्दियों की धूप

सर्दियों की धूप है ये,  

प्रतीक्षा के पलों में

अनमना खोया कोई है,

थिरकती नज़रों से पूछे

याद आता क्यों कोई है !

आगमन की व्यग्रता है,  

सुलगता अहसास ये है,

आँख क्यों मुंदने लगी है

वो तो आस पास ही है !

सुखद है अनुभूति स्नेहिल

सौम्यता का सेंक सा है,

आंगनों में झांकता है

ये बड़ा दिलफेंक सा है |

अनमयस्क सा भटकता

छतों पर ये छा गया है,  

उनींदे सुरमई नयन को  

गुनगुना ये भा गया है |

फिसलता  है सिमटता  ये

हवाओं की चोट पर है,

खेलती नन्ही गिलहरी

जैसे उस अखरोट पर है |

बादलों से झाँकता है  

देदीप्य अभिरुप है ये,

सर्दियों की धूप है ये———-  

  

 

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3 टिप्पणियाँ “सर्दियों की धूप” पर

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