आखिर कब तक

आखिर कब तक !

चुनाव नजदीक आते ही

सज जायेगें दल बदल के बाजार ,

तिलक ,तराजू और तलवार

बने रहेगें चुनावी समर के हथियार ,

उम्मीदवारों के चयन का

जाति और धर्म  होगा आधार ,

जातियों के समीकरण का गणित

तय करेगा वोटों का व्यापार ,

अपराधी ,बाहुबली और माफिया

बनाये जायेगें उम्मीदवार ,

चुनावी सावन में नेता जी

करते रहेगें वादों की बौछार

भाड़े के कार्यकर्ताओं को जुटा कर

करवाया जाता रहेगा  चुनाव प्रचार ,

मतदाता नोट के बदले में वोट  

बेचने का करेगें कारोबार ,

और दो चार मतों का अंतर भी 

माना  जाएगा जीत का आधार ,

कब तलक ये लोकतंत्र

यूँ ही होता रहेगा शर्मसार

बार बार  हरेक बार ………

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